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Wednesday, August 9, 2017

शौर्य बलिदान की गाथा कहता लोकपर्व कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.

महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

Tuesday, October 20, 2015

बुन्देली लोकोत्सव - टेसू और झिंझिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र अपने आन-बान-शान के लिए जितना प्रसिद्द है उतनी ही प्रसिद्धि उसको यहाँ की लोकसंस्कृति के कारण प्राप्त है. यहाँ की लोककलाओं, लोकपर्वों, लोकविधाओं आदि में अनेकानेक गतिविधियाँ संचालित होती हैं.लोक को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानने के कारण ही यहाँ जन्मे लाला हरदौल अपने व्यक्तित्व, कृतित्व के कारण लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं. लोक को महत्त्व देने के कारण ही यहाँ मामुलिया, टेसू, झिंझिया, नौरता, सुआटा आदि के साथ-साथ अन्य कई लोकपर्वों का आयोजन होता रहता है. समूचा बुन्देलखण्ड क्षेत्र लोक की विविधता और जीवन्तता के कारण विशेष स्थान बनाये हुए है. इसी लोक परम्परा में टेसू भी शामिल है जो किसी एक वीर पुरुष को परिभाषित करता है. इस वीर पुरुष को याद करते हुए एक गीत गाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में टेसू गीत कहा जाता है. हालाँकि टेसू के बारे में प्रमाणिक रूप से किसी धर्मग्रन्थ में अथवा किसी ऐतिहासिक ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता है. वाचिक परंपरा के कारण टेसू एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता आ रहा है.  

             भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषता ये रही है कि यहाँ धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों के द्वारा किसी न किसी तरह की सीख सबको देने का प्रयास किया जाता है. सहयोगी भावना के साथ, सामंजस्य के साथ कैसे एक-दूसरे के सहयोग से कोई कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया जा सकता है, ये सहजता से सीखने को मिल जाता है. लोक संस्कृति में भी इसी तरह के संस्कार देखने को मिलते हैं. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आयोजित किये जाने वाला टेसू लोकपर्व हो, झिंझिया हो, सुआटा हो अथवा मामुलिया, सभी में बच्चों की सहभागिता रहती है. ऐसे आयोजनों के द्वारा बच्चों में सहयोग की भावना का विकास होता है, समन्वय की भावना जन्मती है और खेल-खेल में अपनी लोक संस्कृति को जानने-समझने का अवसर भी मिलता है. टेसू, झिंझिया, सुआटा, नौरता, मामुलिया आदि का आयोजन की अपनी ही विशेषता है. ये सारे लोक आयोजन एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, जो लगभग एक माह तक आयोजित होते रहते हैं. ये आयोजन कई चरणों में संपन्न होता है. भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन पूर्णिमा , जिसे शारदीय पूर्णिमा भी कहा जाता है, तक पाँच चरणों में इस आयोजन को संपन्न किया जाता है. बुन्देलखण्ड में किशोर-किशोरियों द्वारा इस क्रियात्मक विधान का अपना महत्त्व माना जाता है. मामुलिया से आरम्भ होकर ये आयोजन  नौरता, टेसू, झिंझिया से गुजरता हुआ अंत में टेसू द्वारा सुआटा को मारकर झिंझिया से विवाह करने पर समाप्त होता है.

मामुलिया किशोरियों का खेल है जिसे भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर कृष्ण आमावस्या तक खेला जाता है. इस लोक आयोजन को दो भागों में किशोरियों, लड़कियों द्वारा पूरा किया जाता है. उनके द्वारा किसी दीवार पर पूर्वाभिमुख किये हुए एक आयाताकार आलेख बनाया जाता है. इसको बाहरी साज-सज्जा के साथ अंदर ऊपर की ओर दोनों कोने में सूर्य तथा चन्द्र द्वारा अलंकृत किया जाता है. सांयकाल किशोरी बालिकायें झुण्ड बनाकर एकत्र होती हैं और किसी काँटेदार टहनी को फूलों से सजा गीत गाती हुई गली-गली घूमती हैं. इसी टहनी को मामुलिया कहा जाता है, जिसे सूर्यास्त के बाद किसी जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है. ऐसा करने के बाद बालिकाएँ स्व-निर्मित आयताकार आलेख के पास एकत्र होती हैं. इस आलेख पर गोबर की थाप्पियाँ चिपकाना, लोकगीत, भजन आदि गाना इन लड़कियों द्वारा किया जाता है. ऐसा प्रतिदिन किया जाता है.

इसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तक नवरात्रि के आयोजन में एक खेल नौरता का आयोजन किया जाता है. इसके अंतर्गत सुआटा नामक राक्षस की प्रतिमा को गोबर से बनाया जाता है. इस प्रतिमा को रंगों, कौड़ियों आदि से अलंकृत किया जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ऐसी किंवदन्ती है कि यही सुआटा राक्षस लड़कियों, किशोरियों को परेशान करता था. इसी के द्वारा झिंझिया राजकुमारी का अपहरण कर लिया गया था. बाद में वीर राजकुमार टेसू सुआटा को मार डालता है तथा झिंझिया को मुक्त कर उससे विवाह करता है. इसी के साथ मान्यता है कि सुआटा को अविवाहित बालिकाओं द्वारा खेला जाता है और जो लडकियाँ इसे खेलती है उन्हें विवाहोपरान्त इससे मुक्ति लेनी होती है. इसके लिए भी एक लोक आयोजन संपन्न किया जाता है. इसमें विवाह के बाद सर्वप्रथम पड़ने वाले इस लोकपर्व में नवमी के दिन सुआटा उजाया जाता है.

इस लोक आयोजन में मामुलिया, सुआटा के पश्चात टेसू और झिंझिया का खेल होता है. टेसू आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. टेसू बाँस की तीन डंडियों से बना एक ढाँचा होता है, जिसे रंग-बिरंगे कागजों से ढँक दिया जाता है, सिर पर मुकुट और हाथ में ढाल-तलवार से इसको सजाया जाता है.  टेसू के खेल में लड़के उस रंग-बिरंगे ढाँचे को लेकर घर-घर जाते हैं और टेसू-गीत गाते हुए धन की माँग करते हैं. बालकों द्वारा गाये जाने वाले ये गीत विनोदी होते हैं और कई बार महज तुकबंदी के रूप में प्रयुक्त होते हैं. अनर्थक, देशज शब्दों का प्रयोग कर इन बालकों का उद्देश्य गीत को लय देना और हास्य प्रदान करके धन की प्राप्ति करना होता है. इसके चंद उदाहरण दृष्टव्य हैं.

टेसू आये वानवीर
हाथ लिए सोने का तीर
एक तीर से मार दिया
राजा से व्यवहार किया
राजा बोले हुर्र के,
दाढ़ी लगी ओके की,
लग गई तिलोक की,
तीन तिलोका कहाँ चले,
अत्ती के पावन,
अत्ती मेरा हींसा,
चार का चालीसा,
चालीसा की धारें,
लग गई किनारे,
नौ मन पीसें, दस मन खाय,
घर-घर टेसू माँगन जाय,
पड़वा बोले आँय.

इसी तरह से कई बार लड़के दानदाता के सामने कुछ इस तरह से अपनी बात रखते हैं-

टेसू अगड़ करैं, टेसू झगड़ करैं,
टेसू लेई के करैं.

और कहीं-कहीं ऐसे भी कि-

मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी, टेसू माँगे अठन्नी.
इस तरह से अनेक निरर्थक बातों-गीतों के द्वारा बालकों का टेसू आयोजन चलता रहता है.

लड़कियों द्वारा झिंझिया के स्वरूप हेतु मिट्टी का छोटा घड़ा लिया जाता है, जिसमें अनेक छेद किये जाते हैं. इसके अंदर अनाज तथा उसके ऊपर जलता दीपक रख दिया जाता है. इसे ही झिंझिया कहा जाता है. इसमें बालिकाएँ ‘झांझी से झांझी तेरो ब्याह रचाओं’ गीत गाती हुई नृत्य भी करती हैं. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय भी होता है जो बालिकाओं की प्रसन्नता को दर्शाता है. इस घड़े को लेकर किशोरियों द्वारा घर-घर जाकर दानस्वरूप धन अथवा या अनाज की माँग करती हैं. कई जगह बालिकाएँ अन्य गीत गाते हुए दान चाहती हैं-

नये कुआँ में दिया जलत है, कमल फूल उतराए सुगना.
इन गलियन से ससुरा निकले, ससुरा प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने ससुर को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.
इन गलियन से जेठवा निकले, जेठवा प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने जेठ को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.
इन गलियन से सजना निकले, सहना प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने सजन को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.


इस लोक आयोजन के अंत में शारदीय पूर्णिमा को टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है. उससे पहले लड़कियों द्वारा पूर्वाभिमुख दीवार पर बनाये आलेख और सुआटा राक्षस की प्रतिमा को बालकों द्वारा खंडित किया जाता है. उसके अंग-प्रत्यंगों को निकाल कर इधर-उधर फेंक दिया जाता है, जो इस बात का सूचक होता है कि टेसू वीर द्वारा सुआटा राक्षस का अंत कर झिंझिया को मुक्त करा लिया गया है. इसके पश्चात पूरे धूमधाम से लड़के-लडकियाँ मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह करवाते हैं. इस लोक आयोजन में विशेष बात ये होती है कि इसमें अमीर-गरीब का भेद नहीं होता है. इस खेल में सभी घरों के लड़के-लडकियाँ शामिल होकर एकसाथ खेलते हैं और धन या अनाज माँगने की प्रक्रिया किसी तरह की भिक्षा न होकर अधिकार जैसा होता है. बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में आज भी ये लोक आयोजन पूरे उत्साह, धूमधाम से मनाया जाता है. 

Wednesday, November 28, 2012

बुन्देली लोकोत्सव : टेसू-झिंझिया का विवाह

बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से पर्वों-त्योहारों से सराबोर रहा है. यहाँ भांति-भांति के अनुष्ठान आये दिन संपन्न होते रहते हैं. मेलों, पर्वों, त्योहारों से यहाँ की संस्कृति के दर्शन भी भली-भांति होते रहते हैं. इसी तरह के आयोजनों में टेसू-झिंझिया का विवाह भी शामिल है. इस आयोजन में किशोर वय के युवक-युवतियाँ भाग लेते हैं और बड़े ही उत्साह के साथ इसे संपन्न करते हैं. आश्विन माह में मनाये जाने वाले इस त्यौहार में युवक और युवतियाँ अपने-अपने अलग-अलग समूह बनाकर उत्सव मनाते हैं और फिर शरद पूर्णिमा को, जिसे बुन्देलखण्ड में टिसुआरी पूनों के नाम से जाना जाता है, दोनों समूह मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह रचाते हैं.
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टेसू –
इस उत्सव को आश्विन माह में मनाया जाता है. इसे किशोर वय के युवकों द्वारा मनाया जाता है. इसमें बांस की खपच्चियों के ढाँचे को चमकीले कागज से सजाकर पुरुष आकृति बनाते हैं जिसे टेसू कहा जाता है. इस पुतले को राजसी वस्त्रावरण प्रदान किया जाता है. तीर-कमान, तलवार-ढाल आदि के अलावा सर पर मुकुट या साफा बंधा होता है जो टेसू के राजा होने का संकेत करता है. ऐसी किंवदंती है कि टेसू महाभारत काल के बब्रुवाहन का प्रतीक है जिसे मरणोपरांत शमी वृक्ष पर रखे अपने सिर के द्वारा महाभारत युद्ध देखने का वरदान मिला हुआ था. बाँस की तीन खपच्चियों का ढाँचा उसी शमी वृक्ष का और सिर बब्रुवाहन का प्रतीक समझा जाता है.
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टेसू के रूप में सजे पुतले को लेकर युवा घर-घर, बाजार-बाजार जाते हैं और गीत गाकर उसके बदले में अनाज या कुछ धन की माँग करते हैं. इनके द्वारा गाये गीत के माध्यम से पता चलता है कि टेसू वीर योद्धा था. “टेसू आये बानवीर, हाथ लिए सोने का तीर. एक तीर से मार दिया, राजा से व्यवहार किया”  गाते हुए लड़के शरद पूर्णिमा की रात्रि तक कुछ न कुछ माँगते/एकत्र करते रहते हैं. बालकों द्वारा बड़े ही विनोदात्मक तरीके से गीतों को गया जाता है जिससे उनके इस उत्सव में एक तरह की रोचकता बनी रहती है. कई बार तो लड़के आशु कवित्व के रूप में कुछ भी उलटे-पुल्टे शब्दों को जोड़कर गायन करते रहते हैं. किसी घर, दुकान आदि से कुछ भी न मिलने पर इनके द्वारा “टेसू अगड़ करें, टेसू बगड़ करें. टेसू लैई के टरें” या फिर “टेसू मेरा यहीं खड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा. दही-बड़ा में पहिया, टेसू मांगे दस रुपईया” आदि गाकर मनोरंजक रूप में कुछ न कुछ प्राप्त कर लिया जाता है. बाद में शरद पूर्णिमा की रात को इन्हीं लड़कों द्वारा बड़ी ही धूमधाम से टेसू की बारात निकाली जाती है.
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झिंझिया –
यह उत्सव बुन्देलखण्ड की किशोरियों द्वारा मनाया जाता है. ये भी आश्विन माह में मनाया जाने वाला उत्सव है. इसमें मिट्टी के छोटे से घड़े में अनेक छेद होते हैं. इस मटकी की में कुछ अनाज रखकर उसमें जलता हुआ दीपक रख दिया जाता है. छेदों से बाहर निकलती दीपक की रौशनी अत्यंत मनमोहक लगती है. बालिकाएँ इस जगमगाती मटकी को अपने सिर पर रखकर समूह में घर-घर जाकर नेग स्वरूप कुछ न कुछ माँगती हैं. ये किशोरियाँ भी झिंझिया गीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और ये भी शरद पूर्णिमा को संचित धन से झिंझिया का विवाह टेसू से संपन्न करवाती हैं.
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शरद पूर्णिमा की रात्रि को टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाएँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं. इस नृत्य की प्रकृति बहुत कुछ गुजरात के गरबा नृत्य के जैसी होती है. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय बालिकाओं में प्रसन्नता को दर्शाता है.
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टेसू-झिंझिया विवाह से एक किंवदंती और भी जुड़ी हुई है कि सुआटा नामक एक राक्षस कुंवारी कन्याओं को परेशान करता था, उनका अपहरण कर लेता था और जबरन अपनी पूजा करवाता था. उसी राक्षस ने झिंझिया नामक राजकुमारी को भी बंदी बना लिया था. टेसू नामक राजकुमार ने शरद पूर्णिमा को ही सुआटा राक्षस का वध करके झिंझिया को मुक्त करवाया तथा उससे विवाह रचाया था. बुन्देलखण्ड में बालिकाएँ किसी दीवार पर गोबर से सुआटा राक्षस की आकृति बनाती हैं जिसका वध टेसू द्वारा किया जाता है और तत्पश्चात टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है.
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आधुनिकता के इस दौर में आज भले ही इस उत्सव को व्यापकता से न मनाया जा रहा हो किन्तु बुन्देलखण्ड की आंचलिकता में अभी भी इसके प्रति उत्साह देखने को मिलता है. छोटे-छोटे कस्बों, गाँवों में युवकों-युवतियों में इसके प्रति रुझान देखने को मिलता है. इस कारण ही लुप्त हो चुके अनेक पर्वों, त्योहारों के मध्य टेसू-झिंझिया का विवाह आज भी अपने आपको जीवित रखे हुए है. लोक-कलाओं, लोक-पर्वों, लोक-उत्सवों, लोक-साहित्य, लोक-गीतों के सम्वर्धन के लिए आवश्यक है कि लुप्त होती लोक-कलाओं का, लोक-पर्वों का, लोक-उत्सवों का, लोक-साहित्य का, लोक-गीतों का संरक्षण किया जाये. उनको लोकप्रियता प्रदान की जाये.    

Tuesday, July 14, 2009

बुन्देलखण्ड की कजलियाँ


          आज अपयें बुन्देलखण्ड में कजली को त्यौहार बहुतईं जोर-शोर से मनाओ जात है। सबईं जनन को कजली की बधाइयाँ पहुँचैं। हमाओ बिचार ऐसो है कि बहुतई जनन को जा त्यौहार के बारै में पतई नईं हुईये। ऐसौ जासै है कि कायेसे अब न तौ कौनउ बताबै बारौ है और न आजकल के मोड़ा-मोडि़यन को इत्ती फुर्सत है कि बे सबईं बुन्देलखण्ड के लोक-त्योहारन के बारै में पतौ करैं।
          चलो कौनउ बात नईयाँ, जबईं जाग जाऔ तभईं सबेरो हो जात है।

का होत है कजलिया

          कजली बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लोकपरम्परा-बिस्बास को त्यौहार मानौ जात है। पैलें तो अपन सब जनैं जा समझ लैओ कि जा कजली होत का है। देखो जाये तो जो त्यौहार विशेष रूप से इतै की खेती-किसानी से जुड़ौ है। जा त्यौहार में घर-मुहाल की बैइरनें (औरतें) हिस्सा लेती हैं। साउन के महीना की नौमी से जाकौ अनुष्ठान सुरू हो जात है। सबसें पैंला कितउँ बाहर मैदान से सबईं जनीं मट्टी खोद के लियातीं हैं। जा मट्टी कौ गा-बजा कै पूजन करतीं हैं और बाकै बाद में नाउन से छोयले के दोना मँगवा कै बामें जा मट्टी धर देतीं हैं। अब जामैं गेंहू और जौ को बो दऔ जात है। घर की जनीं रोजई सबेरे इन दोनन में दूध-पानी चढ़ाउतीं हैं, इनकी पूजा करतीं हैं। बाद में साउन महीना की पूनौ कों इन दोनन को सबईं बैइरनें अपने पासई के तलबा पै लै जातीं हैं। उतै पै सबईं कजली गीत गाउत भईं कजली खोंट लतीं हैं और सबईं दोनन को तलबा में सिरा देती हैं। खोंटीं भई कजलियाँ सबईं आदमियन-औरतन-बच्चन को बाँटी जातीं हैं और इनै आदर से सर-माथै पै लगाऔ जात है। कहूँ-कहूँ जई कजलियन को भुंजरियउ कहो जात है।
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          खेती-किसानी के अच्छे से होबै के लानै जो कजली को त्यौहार मनाऔ जात हतौ पर बाद में महोबा में जा दिना भई लड़ाई के बाद सें, एक ऐतिहासिक घटना होबै के बाद से जाये विजयात्सव के रूप में मनाऔ जान लगो है।
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का हतो किस्सा जा कजलियन कौ 
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          महोबे के राजा हतै राजा परमाल, उनकी बिटिया राजकुमारी चन्द्रावलि को उठाबै कै लानै दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबे पै चढ़ाई कर दई हती। राजकुमारी उतै कै कीरत सागर ताल पै कजली सिराबै कै लानै अपनी सबईं सखी-सहेलियन के संगै जा रई हती। राजकुमारी कौ पृथ्वीराज उठा न पाबै जाकै लानै बा राज्य के बीर-बाँकुर आल्हा और ऊदल नै अपनौ अचम्भै में डारबै बारौ पराकरम दिखाऔ हतौ। इन दोउ बीरन के संगै-संगै चन्द्रावलि को ममैरौ भइया बीर अभई उरई सै जा पहुँचो हतौ। 
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          कीरत सागर ताल के पासई में होन बारी जा लड़ाई में अभई बीरगति को प्यारौ भऔ, राजा परमाल को एक बेटा रंजीतउ सहीद भऔ। कही तौ जउ जात है कि अभई जैसौ बीर सर कटबै के बादउ बहुतईं देर तक लड़ाई लड़त रऔ। बाद में आल्हा, ऊदल, लाखन, ताल्हन, सैयद राजा परमाल कौ लड़का ब्रह्मा, जगनिक जैसें बीरन ने पृथ्वीराज की सेना को उतै से हरा कै भगा दऔ। महोबे के पराक्रमियन की जीत होबै के बादईं राजकुमारी चन्द्रवलि ने और तमाम सारी जनियन ने अपईं-अपईं कजिलयन को खौंटो।
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          जई घटना के बाद सें महोबे के संगै-संगै पूरे बुन्देलखण्ड में कजलियन को त्यौहार विजयोत्सव के रूप में मनाऔ जान लगौ है।  जा पूरी घटना यदि सुनौ तो सबईं की आँखन में तरईंयाँ भर आउतीं हैं पर अब लगत है कि हमायै इतै के लोगन कै लानै जे सब बातैं बेकार की हो गईं हैं। कभउँ सात-सात दिना तक चलबै बारै जा कजली त्यौहार कौ रंग अब एकई दिना में सबकै मन से उतर जात है। 
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          चलौ कौनउ बात नईंयाँ फिरउ एक बार प्रेम से तौ बोल लैओ जय बुन्देलखण्ड।

Monday, June 16, 2008

बुन्देली लोकोत्सव : कजली

विन्ध्य पर्वत श्रणियों के बीच बसे, सुरम्य सरोवरों से रचे-बसे, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरे बुन्देलखण्ड में ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बाण-शान की अद्भुत छटा के दर्शन होते ही रहते हैं. यहाँ की लोक-परम्परा में कजली का अपना ही विशेष महत्त्व है. महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. जब यहाँ के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.
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महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी. सन ११८२ में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. उस समय महोबा शासन के वीर-बाँकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे. रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.
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लगभग २४ घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था.
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ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.