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Wednesday, August 9, 2017

शौर्य बलिदान की गाथा कहता लोकपर्व कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.

महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

Sunday, June 22, 2014

रावण के मोहपाश में बनवाई लंका मीनार

प्राचीन समय में कालप्रिया के नाम से प्रसिद्द नगरी वर्तमान में कालपी के नाम से जानी जाती है। किंवदंतियों के आधार पर कालपी नगर चौथी शताब्दी में वसुदेव द्वारा बसाया गया था। बुन्देलखण्ड के जनपद जालौन की तहसील कालपी अपने में ऐतिहासिकता को संजोये हुए है। महाभारत के रचयिता वेद व्यास की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी अपनी राजनैतिक-ऐतिहासिक गाथा है। कालपी ऐतिहासिक नगर है जहाँ पुराने समय से लगातार राजनीतिक उथल-पुथल होती रही है। सन् 1196 ई० में यह नगर कुतुबुद्दीन के आधिपत्य में आया। सन् 1527 ई० में जौनपुर और बिहार दोनों पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद बाबर ने कालपी पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ ने कालपी को अपने अधिकार में सन् 1540 ई० तक रखा। अकबर के समय में कालपी सरकार का मुख्यालय रहा। बाद में मराठों ने इस नगर को राज्य के मुख्यालय का रूप दिया। मई, सन् 1858 ई० में झाँसी की रानी के नेतृत्व में यहाँ भयंकर युद्ध हुआ जिसमें राव साहब और बाँदा के नवाब का पूरा सहयोग था। कहते हैं कि  अकबर के प्रसिद्ध दरबारी बीरबल भी कालपी के ही थे। अपनी इस ऐतिहासिकता के साथ-साथ कालपी में मनमोहक ऐतिहासिक, धार्मिक दर्शनीय स्थल भी बने हुए हैं, जो कालपी की गौरवगाथा स्वयं सुनाते हैं। यहाँ बहती यमुना नदी के किनारे सूर्य मंदिर अपनी आभा को चहुँ ओर प्रकीर्णित कर रहा है। व्यास मठ, चौरासी गुम्बज के साथ-साथ कालपी नगर में स्थित लंका मीनार अपने आपमें अद्भुत है। 

          कालपी स्थित लंका मीनार नाम से विख्यात एक मीनार है जो नगर के रावगंज मोहल्ले में स्थित है। कुतुबमीनार की तरह दिखने वाली इस मीनार का निर्माण सन् 1857 ई० में कालपी निवासी, जनपद के ख्यातिलब्ध वकील बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने करवाया था। बाबू मथुरा प्रसाद निगम जी अपने समय में रामायण प्रसंगों पर आधारित रामलीला में रावण के किरदार का पूरी जीवन्तता के साथ निर्वहन करते थे। उनकी तन्मयता का आलम ये था कि उनको लंकेश के नाम से ही जाना जाता था तथा अपने पात्र रावण के मोहपाश में वे ऐसे बंधे कि रावण की स्मृति को संरक्षित करने की दृष्टि से बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने सन् 1857 ई० में 210 फुट ऊंची लंका मीनार का निर्माण करवा दिया। इस मीनार को बनवाने के लिए उन्होंने अपनी समूची जायदाद भी बेच डाली थी। कहा जाता है कि सीप, उड़द की दाल, शंख, कौड़ियों आदि से बनी इस मीनार को बनने में बीस वर्षों का समय लगा और लगभग एक लाख पचहत्तर हजार रुपये लागत लगी।
          इस मीनार की विशेषता इसका निर्माण और इसकी स्थापत्य-कला है। सात मोड़ों अर्थात सात चक्कर, के रूप में बनी 173 घुमावदार सीढ़ियाँ इस मीनार में अन्दर बनी हुई हैं। ये साथ मोड़ रामचरित मानस के सात सोपानों (कांडों) के परिचायक हैं। मीनार के चारों ओर लंका कांड की चित्रमय प्रस्तुति उकेरी गई है, जो इस मीनार को भव्यता प्रदान करती है। इसके बुर्ज पर 15 फुट ऊँची छत्रसहित ब्रह्मा जी की मूर्ति स्थापित थी जो सन् 1934 ई० में आये भूकंप में टूट कर लटक गई थी और आज भी उसी रूप में मीनार के साथ जुड़ी हुई है। 

लंका मीनार परिसर में इस मीनार के अतिरिक्त बाबू मथुरा प्रसाद निगम ने भगवान शंकर का मंदिर भी बनवाया था, जिसका उद्देश्य ये था कि शिवभक्त रावण अपने महल से शिव को सदैव देखता रहे। इसके अतिरिक्त मीनार परिसर में रावण दरबार, अयोध्यापुरी, जनक द्वारिका, शनिदेव मंदिर, मथुरापुरी की छवियाँ निर्मित होने के साथ-साथ बारह विष्णु अवतार, 27 नक्षत्र तथा चारों युगों से संदर्भित आकर्षक प्रतिमाएँ स्थापित हैं। लंका मीनार परिसर की चाहरदीवारी पर बना नाग-नागिन का जोड़ा भी मन मोह लेता है।
स्व० मथुरा प्रसाद निगम का रावण भक्त परिवार भगवान राम के प्रति भी आस्थावान है और पूर्वजों की परम्परा को कायम रखते हुए आज भी रामलीला का आयोजन करवाता है। इस रामलीला की अनूठी बात यह है कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक पर्व दशहरा मेला यहाँ संपन्न होता है किन्तु उसका समापन रावणदहन से न होकर उसकी आरती से होता है।
अपने क्षेत्र की भव्यता और ऐतिहासिकता को अपने में समाहित किये लंका मीनार आज रखरखाव के अभाव में लगातार क्षरण का शिकार हो रही है। लंकेश के नाम से प्रसिद्द मथुरा प्रसाद निगम के परिवार ने इस मीनार के रखरखाव हेतु सरकार से अपील की है। डेढ़ सौ वर्षों से अधिक की विशाल परम्परा को अपने में संजोये इस मीनार को संरक्षित-सुरक्षित रखना स्थानीय निवासियों और प्रशासन की भी जिम्मेवारी है, जिससे आने वाली पीढ़ी अपने क्षेत्र के इतिहास से परिचित हो सके।
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चित्र मित्र विनीत चतुर्वेदी एवं लेखक द्वारा