Sunday, June 24, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 40

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 

17 जून 1857 को जालौन से भागने पर जालौन-ग्वालियर रोड पर पशन्ना और ग्रिफिथ को 53वीं नेटिव इन्फेंट्री की वह टुकड़ी मिली जो जालौन से खजाना लेकर ग्वालियर भेजी गई थी। यह टुकड़ी लौट रही थी मगर अब यह अंग्रेजों से बहुत नाराज थी। इसका कारण यह था कि जब यह टुकड़ी खजाना लेकर जाते समय रास्ते में ही थी तभी यहाँ पर उरई में सैनिकों ने बगावत कर दी थी इस कारण अंग्रेजी सरकार ने सिंधिया सरकार को सूचित किया कि जो टुकड़ी खजाना लेकर ग्वालियर भेजी गई है उससे खजाना ग्वालियर पहुचने के पहले ही रास्ते में अपने सैनिक भेज कर सिंधिया ले लें। इस कारण सिंधिया ने ग्वालियर से अपने सैनिक इन उरई वाली टुकड़ी से धन लेने के लिए भेज दिए। ग्वालियर में पदस्थ अंग्रेज अधिकारी यह भी नहीं चाहते थे कि कानपुर और उरई की किसी सैनिक टुकड़ी की मुलाकात ग्वालियर के सैनिकों से हो। सिंधिया के सैनिकों ने इस टुकड़ी से खजाना लेकर इन को वापस कर दिया। उरई की सैनिक टुकड़ी ने यह समझा कि अब उन पर अंग्रेज सैन्य अधिकारी विश्वास नहीं कर रहे हैं तभी उनसे रास्ते में ही धन ले लिया गया है। इस कारण उनको बहुत क्रोध हुआ और वे भी बगावती हो गए। उनने अपने सैनिक अधिकारी तामकिन्सन से कहा कहा कि अब वे उनकी नजरो से फौरन ही दूर हो जाएँ अब उनका कोई भी हुक्म नहीं माना जायगा। तामकिन्सन इतना डर गया कि रात में ही वह भाग निकला और खेत में जाकर छुप गया। वापस लौटती हुई यह टुकड़ी जब रास्ते में पशन्ना के दल को मिली तो वे खुश हुए कि सुरक्षा मिलेगी। मगर यहाँ तो अब बात उलटी थी। यह दल अब बगावती हो गया था उसने सब अंग्रेजों को कैद कर लिया। इनके पास जो भी धन था सब छीन लिया और कैदी की हालत में इनको लेकर जालौन पहुँचे। जालौन में पहुँच कर इन सैनिकों ने पशन्ना से कहा कि यदि वे दो हजार रुपए नगद दें तो नगदी छोड़ कर बाकी सब सामान लौटा देंगे। पशन्ना ने केशवराव के पुत्र शिवराम तातिया से कहा कि सरकारी कोष से दो हजार रु० देकर उनका सामान वापस दिलवाने की व्यवस्था करें परन्तु शिवराम ने इस पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। इतना ही नहीं उसने सैनिकों को चौदह सौ रुपए देकर इन अंग्रेजो के सब सामान और घोड़े खुद ही अपने लिए खरीद लिए।

इधर उरई और कालपी में भी घटनाएं बहुत तेजी से घटी। कालपी के डिप्टी कलेक्टर शिव प्रसाद तो 6 जून से ही ब्राउन से कालपी छोड़ने की आज्ञा मांग रहे थे मगर कालपी जिले का प्रमुख स्थान था इस लिए ब्राउन कालपी पर हर हाल पर अधिकार रखना चाहते थे इस कारण उनको कालपी छोड़ने की आज्ञा नहीं दी गई थी। उरई में 17 जून को सभी अंग्रेजों को मार दिए जाने की सूचना कालपी में शिव प्रसाद को मिली। उरई में एक भी अंग्रेज अधिकारी नहीं रह गया था। उरई से काले खां का क्रान्तिकारी दस्ता किसी भी क्षण कालपी पहुंच सकता था। शिव प्रसाद को अब किसी से कुछ भी पूछना नहीं था। बिना किसी को कुछ बतलाए यमुना पार करके वह भाग गया।

18 जून को विद्रोही सैनिकों ने कालपी पहुँच कर शिव प्रसाद की खोज की परन्तु वह कहीं नहीं मिला। किसी ने शिव प्रसाद को कालपी से जाते हुए नहीं देखा था इससे क्रांतिकारियों ने समझा कि वह कालपी में ही कहीं छुपा होगा। इस कारण उसके बारे में सूचना देने वाले को पांच सौ रु० दिए जाने की घोषणा की गई। शिव प्रसाद कालपी में होते तो मिलते वे तो रात को ही कालपी से निकल लिए थे। विद्रोहियों ने उनके घर का सारा सामान लूट लिया। कालपी के थानेदार बसंतराव की किस्मत खराब थी, उनको भागने का मौका नहीं मिला। विद्रोहियों ने उनको कैद कर लिया और अपने साथ कानपुर ले गए। पता चलता है कि वे किसी प्रकार से बाद में कानपुर से क्रांतिकारियों के चंगुल से भाग निकले थे।

इधर 53वीं नेटिव इन्फेंट्री कंपनी अपने कैदियों पशन्ना, ग्रिफिथ और उनके परिवार के साथ 19 जून को उरई आई। ये अंग्रेज अधिकारी सौभाग्यशाली थे क्योंकि रिसलेदार काले खां का क्रान्तिकारी दल 18 को ही उरई से चला गया था वर्ना इन सबके मारे जाने में कोई सन्देह नहीं था क्योंकि काले खां का नियम था कि किसी भी अंग्रेज को जिन्दा नही छोडना है। 53 नेटिव इन्फेंट्री ने भी इन अंग्रेजों को इनके भाग्य के भरोसे छोड़ा और कानपुर प्रस्थान कर गई। इन अंग्रेजों का साथ देने वाला उरई में कोई नहीं था अत: इन्होंने कदौरा के नवाब या चरखारी के राजा रतन सिंह के पास जाने की सोची। उरई से दक्षिण की राह पकड़ी लेकिन रास्ते में ही गुरसराय के राज के पुत्र शिवराम तातिया के सैनिकों द्वारा पकड़ लिए गए। उरई लाकर इन सबको शिवराम तातिया के आदेश से उरई की संराय में रख कर फर बैठा दिया गया। अगले दिन ग्वालियर कन्टेनजेंट की चार पलटन और 14वीं रेगुलर सवारों का एक दल उरई आया। शिवराम के सैनिकों ने बंदी अंग्रेज अधिकारीयों को इन सैनिकों के सामने पेश किया। सैनिकों का नायक दयालु स्वभाव का था। उसने कहा कि जब इनको कैद करने वाले सैनिकों ने नही मारा, हम लोग ही क्यों मारे। इनको भाग्य के सहारे उरई में छोड़ कर वे सब भी कानपुर प्रस्थान कर गए। पशन्ना और ग्रिफिथ के पास जाने के लिए कोई भी सुरक्षित स्थान नही था, अत वे सब उरई में सराय में ही रुके रहे। लगभग तीन सप्ताह तक ये लोग सराय में ही रुके रहे। 14 जुलाई को क्रान्तिकारी सैनिकों की एक टुकड़ी उरई आई और इसी सराय में रुकी।

14 जुलाई को क्रान्तिकारी सैनिकों की जो टुकड़ी उरई में आकर सराय में रुकी थी। यह सराय उरई में आजकल के गोपालगंज के पास ही थी। अभी भी यह इलाका सराय के नाम से जाना जाता है। बहरहाल, क्रांतिकारी सैनिकों को सुबह 15 तारीख को पशन्ना आदि अंग्रेजों के इसी सराय में रुके होने के बारे में पता चला। इन सैनिकों ने इन अंग्रेजों को मारने का प्रयास किया। सहादत खां और मिया खां नाम के सैनिकों ने पूरा प्रयास कर लिया अंग्रेजों ने दरवाजा अन्दर से बंद कर रखा था इस कारण सफलता नहीं मिली। अब इन लोगों ने आग लगा कर मारने की सोची। अब तक सराय के पास काफी भीड़ लग गई थी। सराय के पास छोटा-मोटा बाजार भी था। इन दुकानदारों को लगा कि आग लगाने से हो सकता है कि वह फैल जाय और उनकी दुकानों को भी आग अपनी लपेट में ले ले क्योंकि दुकानें खपड़ेल की कच्ची ही थीं। इस पर इन दुकानदारों ने आग लगाने का विरोध किया मगर सैनिक आग लगाने को आमादा थे। विरोध करने वालों में गणेश बजाज प्रमुख रूप से आगे था। गणेश ने जब देखा कि इन सैनिकों पर कहने-सुनने का कोई असर नहीं हो रहा है तब उसने सराय के और दुकानदारों को लेकर इन सैनिकों पर पत्थरों की बौछार शुरू कर दी और लाठियां लेकर उन पर पिल पड़े। इससे सैनिकों को सराय से भागने को मजबूर हो गए। इस घटना के कारण एक बार फिर इन अंग्रेजों की जान बच गई और ये सराय में रुके रहे। 17 जुलाई को शिवराम तातिया अपने 300 सैनिकों के साथ कालपी से उरई आया औए इन सब अंग्रेजों को हिरासत में ले लिया। 


+++++++++++++

© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)
++

कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा. 

Saturday, June 23, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 39

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 

16 जून को दिन में झाँसी के क्रांतिकारी सैनिकों का मुख्य दस्ता, 14वीं इररेगुलर घुड़सवार दस्ता कानपुर जाने के लिए रिसालेदार काले खां के साथ उरई पहुंचा। पहले ही लिखा जा चुका है कि इस दल का अग्रिम दस्ता तो 15 को उरई आ गया था परन्तु लूटखसोट के अलावा उसने कुछ और नही किया था। काले खां ने जिले में जिन्दा रह रहे अंग्रेजों को पकड़ने का निश्चय किया। काले खां के क्रोध का एक कारण यह भी था कि अग्रिम दस्ता जालौन के डिप्टी कलेक्टर पशन्हा और ग्रिफिथ को कैद नहीं कर सका था। ये दोनों 15 की रात को ही जालौन की तरफ भाग गए थे। डिप्टी कलेक्टर पशन्हा अपने परिवार के सदस्यों जिसमे उनकी पत्नी, बहिन पांच बच्चे तथा दो भतीजे थे के साथ जालौन की तरफ भागे। उनके साथ दूसरे डिप्टी कलेक्टर ग्रिफिथ भी थे। पशन्हा की माँ बीमार थी कम बैलगाड़ियों की व्यवस्था हो पाने के कारण अपने बंगले में रुकी रह गई। रिसालेदार काले खां के द्वारा 17 जून 1857 को उनकी हत्या कर दी गई। यह उल्लेख अधिकांश इतिहासकारों ने किया है लेकिन जब मैंने अपने मित्र डा० राजेन्द्र पुरवार को साथ लेकर उरई के ईसाईयों के कब्रिस्तान में उनकी कब्र को खोज निकला तब देखा की उसमे उनकी मौत की तिथि 16 जून 1857 अंकित है। अत: कह सकते हैं की काले खां ने उरई आते ही 16 को ही उनको मार कर उनके घर को लूटा होगा।

उरई में तैनात सैनिकों के साथ डा० हेमिंग की भी तैनाती थी। उनको भी दोनों डिप्टी कलेक्टरों के भागने की खबर मिली। अत: उन्होंने भी उरई छोड़ने की सोची। 16 जून की रात्रि को स्थानीय लोगों द्वारा पहने जाने वाले कपड़े पहिने, मुंह में रंग लगाया और चुपके से रात के अँधेरे में कचेहरी से सीधे कालपी जाने वाले शार्टकट रास्ते को पकड़ा। पकड़े जाने के भय से डर कर मुख्य सडक छोड़ बीहड़ की पगडंडी से चले। रात भर बीहड़ में चलते रहे रास्ता और दिशा दोनों ही गडबडा गई। सूर्योदय के समय कालपी के पास होना चाहिए था लेकिन रास्ता भटक जाने के कारण उलटे फिर उरई का ही रास्ता पकड़ लिए थे। उन्होंने अपने को उरई कचेहरी की सीमा पर पाया। रात भर पैदल चलने के कारण प्यास से व्याकुल थे, अत: कचेहरी में स्थित कुंए पर आकर प्यास बुझाई। उसी समय कुछ सैनिक भी नहाने धोने के लिए कुंए पर आए। डा० हेमिंग यद्यपि वेष बदले हुए थे मगर 12 इन्फेंट्री के सैनिकों ने उनको पहचान लिया और 17 जून को कुंए पर ही उनका वध कर दिया।

इंग्लिश आफिस में मिस्टर डबल हेड क्लर्क थे। इनके परिवार में इनकी पत्नी, पुत्र था सासु जी श्रीमती पिलिन्गटन भी उरई में ही रहती थीं। डबल साहब को 15 को ही डिप्टी कलेक्टरों के भागने का पता चल गया था। 15 की रात को यह परिवार भी उरई से भागा और कुछ कोस का सफर तय करके खरका-कुइया के बीहड़ में छिप गया। 16 जून का पूरा दिन इन लोगों ने छिप कर बिताया क्योंकि दिन में सफर करने पर पकड़े जाने का भय था। 16 की रात्रि को हमीरपुर जिले में जाने के लिए इन लोगों ने यात्रा शुरू की। अनजाना रास्ता रात में बीहड़ का सफर। रात भर बीहड़ में चलते रहे लेकिन सुबह एर गाँव के पास ही अपने को पाया। 17 की सुबह थी, दिन को यात्रा की नही जा सकती थी अत: फिर बीहड़ में छिपे रहे लेकिन मौत तो साथ-साथ चल रही थी। एर गाँव के सुबराती, खैराती और पल्टू किसी कार्य से बीहड़ की तरफ आए। इन लोगों की निगाह छिपे हुए अंग्रेजों पर पड़ी। तीनो ने इन अंग्रेजों को पकड़ने का निश्चय किया परन्तु मि० डबल की बंदूक से डर लग रहा था। इसके बाद भी तीनो ने हिम्मत नहीं हारी और युक्तिपूर्वक सबको बंधक बना लिया। तीनो देशप्रेमी डबल और उनके परिवार को उरई लाकर क्रांतिकारियों को सौप दिया। यह 17 जून की तारीख थी, क्रांतिकारियों ने इन सबको मौत के घाट उतार दिया। इस घटना में एक बात तो रह गई आपको बतलाने से। मि० डबल का पांच वर्ष का पुत्र जीवित बच गया था। वह बीहड़ में ही कहीं छुपा रह गया था जो गाँव की एक औरत को जब वह बीहड़ में लकड़ी इकठ्ठा करने गई मिला। कहा नहीं जा सकता कि दयावश ममता के कारण या इनाम के लालच में वह बच्चे को अपने घर ले आई। इसके बाद किसी जुगाड़ से उसने यह बच्चा झाँसी में एक अंग्रेज महिला मुट्लो के पास पहुँचा दिया। यह अंग्रेज महिला मुट्लो वही महिला है जो झाँसी में 8 जून को झोकनबाग़ में हुए हत्याकांड में बच गई थी और झाँसी में ही कहीं छिपी हुई थी। मुट्लो ने बाद में इस बच्चे को किसी प्रकार दतिया भेज दिया, वहाँ यह दतिया राज के संरक्षण में रहा। मार्च 1858 में जब रोज़ फ़ौज के साथ झाँसी आया तब दतिया के राजा ने इस बच्चे को रोज़ को सौपा। वहाँ से फिर इसको अपने रिश्तेदारों के पास मुंगेर भेजा गया। आइए फिर पीछे लौटे।

17 जून 1857 का वह दिन है जब उरई में एक भी अंग्रेज जिन्दा नहीं बचा था। 15 जून को जो दो अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर अपने परिवार के साथ उरई से भागे थे उन पर क्या गुजरी वह भी जान लें। 15 जून 1857 की रात को डिप्टी कलेक्टर पशन्ना और ग्रिफिथ परिवार सहित उरई से भाग कर कुशलतापूर्वक जालौन पहुचे। जालौन में गुरसरायं के राजा केशवराव और उनके पुत्रों ने डिप्टी कमिश्नर ब्राउन के जालौन से जाते ही कब्जा कर लिया था यह सब विवरण पिछली पोस्ट में लिखा जा चुका है। जालौन में इन अंग्रेजों को खतरे का आभास हुआ अत: इन लोगों ने ग्वालियर का रास्ता पकड़ा लेकिन दुर्भाग्य इनके भी साथ था। 17 जून को जालौन-ग्वालियर रोड पर पशन्ना और ग्रिफिथ को 53वी नेटिव इन्फेंट्री की वह टुकड़ी लौटती हुई मिली जो उरई से खजाना लेकर ग्वालियर गई थी। यह टुकड़ी जब उरई से ग्वालियर के लिए चली थी तब इनके मन में अंग्रेजों के प्रति कोई दुर्भावना नही थी क्योंकि तब तक क्रांति का उद्घोष यहाँ नही हुआ था। लेकिन अब इनके मन में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था वह क्यों यह जानिए, अगली पोस्ट में। 

+++++++++++++


© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)
++
कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

Wednesday, June 13, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 38

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 

केशवराव ने ब्राउन के पत्र को कोई महत्व नहीं दिया और जिले का प्रशासन संभाल कर अपने आदमियों को नियुक्त करना शुरू कर दिया। केशवराव तो शुरू से ही जालौन का राज प्राप्त करना चाहता था। जब जालौन राज की गोद का मामला 1840 में आया मगर अंग्रेजों ने इनकी मांग को अस्वीकार करके जालौन राज को अंग्रेजी राज में समाहित कर लिया था। बिल्ली के भाग से छींका टूटा था। बात यह थी कि केशवराव के कई पुत्र थे और गुरसराय स्टेट छोटी थी, वह चाहता था कि जालौन भी मिल जाय तो सब पुत्रों का भला हो जाय। उसने अपने चौथे पुत्र सीताराम नाना को जालौन का भार दिया जिसमें जालौन, कोंच, उरई और कनार का क्षेत्र था। बड़े पुत्र शिवराम तांतिया का मुख्यालय कालपी में रखा गया जहाँ से उसको कालपी, आटा, मोहम्मदाबाद आदि परगनों को देखना था।

सेना द्वारा क्रांति की शुरुआत करते ही जिले में आम जनता भी क्रांति में शामिल हो गई। डिप्टी कलेक्टर पशन्ना के अनुसार भदेख के राजा पारिक्षित और बिलायाँ के बरजोर सिंह उनके नेता थे। इनके प्रयास से क्रांति की ज्वाला गाँव-गाँव में फैल गई। अभी तक किसी अंग्रेज की हत्या जैसी कोई घटना नहीं हुई थी। 15 जून को झाँसी के क्रान्तिकारी सैनिकों का एक अग्रिम दस्ता कानपुर जाते हुए उरई में रुका। इन सैनिकों ने सबसे पहले जेल को तोड़ कर कैदियों को मुक्त कर दिया। इसके बाद सरकारी कार्यालयों में आग लगा दी। अभी भी बहुत से सरकारी कर्मचारी जिले में रुके हुए थे उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। दो अंग्रेज डिप्टी कलेक्टर अभी भी जिले में रुके थे हालाँकि वे कुछ काम नहीं कर रहे थे लेकिन जब झाँसी के अग्रिम क्रान्तिकारी दस्ते ने उरई में जेल खोल कर कैदियों को मुक्त कर दिया, कचेहरी में आग लगा दी तब उनको अपनी जान बचाने की पड़ी।

जालौन के तहसीलदार इनायत हुसेन ने जालौन के किले को केशवराव से बचाने की बहुत कोशिस की थी। इस कारण केशवराव के लडके ने इनको कैद करके विद्रोही सैनिकों को सौप दिया जो इनको अपने साथ कानपुर ले गए। वहाँ से ये किसी प्रकार बच निकले और बचते बचाते अपने पिता के पास बाँदा पहुंचे जहाँ पर वे डिप्टी कलेक्टर थे।

उरई के तहसीलदार मोहम्मद हुसेन डिप्टी कमिश्नर ब्राउन के चहेते थे। वे उरई छोड़ते समय अपनी पूरी संपति इनको ही सौंप गए थे। ये भी जान बचा कर उरई से भागे और इटौरा पहुंचे। इटौरा के जमीदार भी क्रांति समर्थक थे उन्होंने इनको पकड़ लिया और इनका सब धन लूट कर जाने दिया। क्रांति की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने इनको फतेहपुर जिले में तहसीलदार नियुक्त किया था।

आटा के तहसीलदार हमीद-उल-जमा भाग कर अपने पिता के पास हमीरपुर पहुंचे जहाँ पर वे डिप्टी कलेक्टर थे। फिर वहां से पिता पुत्र अपने वतन रामपुर स्टेट चले गए।

माधोगढ के तहसीलदार गुलाम हुसेन खां अंग्रेजों के पक्के समर्थक थे। इनका जन्म 18 मार्च 1828 को हुआ था। इन्होने 50 रु० महीने पर हमीरपुर में जेल दरोगा के पद से नौकरी शुरू की थी। 24 मार्च 1857 को ये जिले में तहसीलदार के पद पर आए थे। तीन माह के अन्दर ही क्रांति का आगाज हो गया। लहार के तहसीलदार के विद्रोहियों के साथ मिल जाने पर इन्होने लहार के तहसीलदार का पद भी संभाल लिया। बड़ी हिम्मत से ये अगस्त तक माधोगढ में जमे रहे फिर भाग कर कानपुर चले गए। बाद में ये कानपुर में तहसीलदार भी बनाए गए।

लहार के तहसीलदार नारायणराव क्रांतिकारियों के साथ थे। इन्होंने पहले केशवराव के साथ फिर ताईबाई के साथ जिले में कार्य किया।

कोंच के तहसीलदार शिव प्रसाद, मदारीपुर के तहसीलदार मुहम्मद हुसेन दबोह के चिराग अली अंग्रेजों के समर्थक रहे। इन्होने क्रांतिकारियों से अपनी जान किस प्रकार बचाई यह पता नहीं चल सका। इतना तो समझा जा सकता है कि यहाँ से भागे पर पता नही चला कि भाग कर कहाँ गए और कैसे गए।

पुलिस के थानेदरों में से केवल बंगरा के थानेदार मोहम्मद अली ही विद्रोहियों के साथ थे। बाकी सब अंग्रेजों के समर्थक थे और झाँसी से विद्रोही सैनिकों के आते ही जिले से भाग लिए। क्रांतिकारियों ने उरई के थानेदार खुर्रम अहमद के घर पर धावा मारा मगर उनको इसकी भनक पहले से ही लग गई थी इस कारण वे पहले ही निकल लिए थे। ये अवध के रहने वाले थे अत: वहीं गए।

छोटे कर्मचारियों में से ज्यादातर ने केशवराव की नौकरी स्वीकार कर ली थी इस कारण सैनिकों ने उनको कोई नुकसान नहीं पहुँचाया क्योंकि केशवराव को क्रन्तिकारियों का साथ देने वाला माना गया। जब सैनिकों ने डिप्टी कमिश्नर ब्राउन की कोठी पर छापा मारा तब उनको उनके खास सेवक गोपाल सिंह के बारे में पता चला। ब्राउन के धन के बारे में वही सूचना दे सकता था। उसको बहुत खोजा गया पर वह नहीं मिला और उरई में ही कहीं पर छिप गया। उसको तो नहीं पकड़ा जा सका मगर दूसरे नौकरों ने वह जगह बतला दी जहाँ पर गोपालराव ने ब्राउन के धन से भरे 23 बक्से जमीन में गाड़े थे। कुछ बक्सों को गोपाल सिंह ने कुँए में डाल दिया था सैनिकों ने उनको भी निकाल लिया। ये सब घटनाए 15 जून को घटीं। यह दल केवल लूटपाट करता रहा उसने उरई में रह रहे किसी अंग्रेज को कैद करने की कोशिश नहीं की।

16 जून को झाँसी से कानपुर जाने वाला मुख्य सैनिक दस्ता रिसालेदार काले खां के साथ उरई पहुंचा। काले खां ने जिले में बचे अंग्रेजों को न पकड़ने के कारण अग्रिम दस्ते के कामों पर बड़ा क्रोध किया मगर कुछ किया नहीं जा सका क्योंकि अग्रिम दस्ता रात को ही कानपुर के लिए प्रस्थान कर गया था।
रिसालेदार काले खां ने उरई में क्या किया अब यह सब अगली पोस्ट में। धन्यवाद


+++++++++++++

© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)
++
कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.