Saturday, September 11, 2021

सम्पादकीय लेख लिखने पर बेनीमाधव तिवारी को राष्ट्रद्रोह की सजा

देवेन्द्र सिंह जी 
बेनीमाधव तिवारी जी जालौन जिले के पहले व्यक्ति थे जिनको राष्ट्रद्रोह के जुर्म मे सजा दी गई थी। नई पीढ़ी के लोगों को जानकारी ही नहीं होगी और पुराने लोग तो भूल ही चुके होंगे कि स्वतन्त्रता आंदोलन में जिले के बेनीमाधव तिवारी जी को राष्ट्रद्रोह की सजा दी गई थी। यदि किसी को जानकारी भी होगी तो उनको शायद इसकी जानकारी न हो कि उनको यह सजा क्यों दी गई थी। 

असल में तिवारी जी को अपने अखबार देहाती में एक संपादकीय लेख लिखने के कारण यह सजा दी गई थी। तिवारी जी एक समाचार पत्र देहाती का सम्पादन-प्रकाशन करते थे। उनके समाचार पत्र के शीर्षक या मोटो से ही पता चलता है कि यह एक राष्ट्रवादी विचारधारा का पत्र था। समाचार पत्र का मोटो ये था-


मेरी गाय रहे, मेरे बैल रहें, घर-घर में भरा नित राज रहे।

मेरी टूटी मड़ैया में राज रहे, कोई गैर न दस्तांदाज रहे।।


गोपीनाथ शाहा बंगाल के क्रांतिकारी थे और युगांतर दल के सदस्य भी थे। सर चार्ल्स टेगर्ट पुलिस उपायुक्त था। वह हद दर्जे का ज़ालिम था। अत: क्रांतिकारियों ने उसको मारने का निश्चय किया और यह काम गोपीनाथ शाहा को दिया गया। गोपीनाथ की गोली से टेगर्ट तो बच गया पर अर्नेस्ट डे नाम का अधिकारी मारा गया। गोपीनाथ पकड़े गए और उनको 12 जनवरी 1924 को फाँसी पर लटका दिया गया। फाँसी के समय शाहा की उम्र केवल 24 वर्ष थी। साहा को फाँसी देने की खबर तो अखबारों में छपी पर इसके विरोध में लिखने की हिम्मत किसी अखबार ने नहीं की। इस फाँसी की गूँज उरई में बेनीमाधव तिवारी को सुनाई दी जो देहाती अखबार निकालते थे और उसके संपादक भी थे। उन्होंने एक संपादकीय अपने समाचार पत्र में लिखा। उन्होंने जो लिखा, वह मित्रों से साझा करता हूँ। इसका शीर्षक था - 

भारतीयों के खून की बूंदें भारत की आज़ादी का घोषणा पत्र लिख लिख रही हैं


जहाँ में उनका आना ही मुबारक है मुबारक है।

रहें सफ़ में शहीदों के ज़ो अपने खूं में तर होकर।।


धन्य हैं वे आदमी ज़ो आत्मसम्मान और आज़ादी के नाम पर अपने प्राणों की आहुति दे अनन्त काल के लिए अमर हो जाते हैं।


हँसते-हँसते फाँसी के फंदे में अपनी गर्दन फँसा कर फट से अपने जीवन के फूल को फेंक देना, और गनगनाती हुई गोलियों को गले लगा कर देश और कौम के लिए मर मिटना, ओह! कितनी बड़ी बात है। उनके कार्यप्रणाली से किसी-किसी का मतभेद हो सकता है, उनके विचारों से कोई भी विभिन्नता प्रकट कर सकता है, पर उनकी आजादी की लगन और उनके नि:स्वार्थ बलिदान की कौन सराहना न करेगा?


खुदीराम बोस, सत्येंद्र, कनहाई, लाल दत्त और मि. टिगर्ट के धोखे में मि. डे की हत्या करने वाला गोपीनाथ शाहा आदि एक श्रेणी के आदमी हैं, जिन्होंने देश और कौम का नाम लेकर सरकार की शूली का स्वागत किया और मारना तथा मरना ही अपना सिद्धांत रखा।


दूसरी ओर जालियाँवाला बाग के शहीद राय बरेली के किसान और जैतू के अकाली जत्थे आदि हैं जो नौकरशाही और नाभाशाही के गोलियों के शिकार हुए और जिनका देश और कौम के नाम पर शत्रु का नहीं किन्तु अपना बलिदान करना ही अटल सिद्धांत कहा जा सकता है।


इसमे संदेह नहीं कि यदि भारत आज स्वतंत्र होता तो उसमे ऐसी हत्याएँ और बलिदान कदाचित और कदापि न होते। अस्तु हमें दृढ़तापूर्वक यह कहना ही पड़ता है कि इन दोनों प्रकार की हत्याओं अथवा खून के वे ही जिम्मेदार हैं जिनके कारण सबसे प्राचीन और संसार की सभ्यता के जन्मदाता हमारे भारत पर परतंत्रता की मुहर लगी हुई है।


हम चाहते हैं कि ऐसी हत्याएँ और खून भारतवर्ष में सदा के लिए बंद हो जायें और उनके बंद करने का केवल यही जरिया है कि भारतवर्ष में स्वराज स्थापित हो जाये, परंतु ब्रिटेन के राजनीतिज्ञों को कदाचित इसी में मज़ा आता है अथवा वे भारतवर्ष की आज़ादी से ब्रिटेन की हानि समझते हैं। इसलिए वे पग-पग पर भारतवर्ष की स्वाधीनता का विरोध करते हैं और प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रीति से ऐसे अनेक हत्याकांडों का समर्थन किया करते हैं।


भारतवर्ष की आत्मा जाग उठी है, वह अपने शरीर के बंधन तोड़ने के लिए बेचैन है। अब वह तलवार और मशीनगनों के ज़ोर से अधिक दिन तक गुलाम नहीं रखा सकता। जो ज़ोर-जबरदस्ती से इन 30 करोड़ आदमियों को गुलाम रखना चाहते हैं, वे अमरीका और आयरलैंड के इतिहास से आँखें मीच लेते हैं। एक कौम दूसरी कौम की हुकूमत का जुआ सदैव अपने कंधे पर रखे रहे यह बिलकुल अस्वाभाविक है।


अस्तु, निसन्देह ब्रिटेन और ब्रिटिश साम्राज्य का हित इसी में है कि वह स्वेछा से भारत में स्वराज स्थापित कर सदा के लिए भारतीयों को अपना मित्र बना ले और नौकरशाही द्वारा होने वाले इन नित नए अत्याचारों को सदा के लिए रोक दे।


मि. टिगार्ट के प्राण लेने की फिक्र, मि. डे की हत्या, गोपीनाथ शाहा को फाँसी का हुक्म, अकाली जत्थे पर गोलियों की वर्षा और भारत मंत्री लार्ड ओलीवर की हाल की घोषणा ने भारतवर्ष में फिर नई समस्या उपस्थित कर दी है और प्रत्येक दिल में तहलका मचा दिया है।  


हम मि. टिगार्ट के प्राण लेने के पक्षपाती नहीं हैं, पर हम अवश्य उस शासन प्रणाली के प्राण लेने के पक्षपाती हैं जिसमें मि. टिगार्ट को ऐसे कृत्य करने का मौका लगता है कि जिनसे देश के नवयुवक इस हद तक उत्तेजित हो जाते हैं।


मि. डे की हत्या को जितना हम बुरा समझते हैं उतना ही बुरा हम उस हुक्म को समझते हैं जिसके कारण हमारे देश के युवक गोपीनाथ शाहा को फाँसी दी जायगी। यदि गोपीनाथ शाहा फाँसी न देकर ब्रिटेन के उन राजनीतिज्ञों की बुद्धि को फाँसी दे दी जाती तो अधिक अच्छा होता कि जिसके कारण भारतवर्ष मे मौजूदा शासन प्रणाली मौजूद है।


अकाली जत्थे पर गोली चला कर नाभाशाही और नौकरशाही के सम्मिलित कृत्यों ने देश के खून को खौला दिया है। भारत मंत्री की हाल की घोषणा ने भारतवासियों की उस आशा और विश्वास को चौपट कर दिया है कि जिसे वे मजदूर सरकार पर लगाए हुए थे।


हम ब्रिटेन के राजनीतिज्ञों से पूछना चाहते हैं कि भारतवासियों के हकों को इस तरह कुचलना और देश के वक्षस्थल को उन्हीं के खून से रँगना अंत मे क्या रंग लायेगा?


पता नहीं कि हमारे इस सवाल का वे क्या उत्तर देंगे पर हम तो संसार के इतिहास को सामने रख केवल इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ अपनी बुद्धि का यदि यों ही परिचय देते रहे और आए दिन इसी तरह भारतीयों के रक्त से भारत की जमीन रंजित होती रही तो भारत की आज़ादी की घोषणा ब्रिटेन द्वारा नहीं किन्तु भारतीयों द्वारा होगी, जिसे आज उनके खून की बूँदें इतिहास के पन्नों पर लिखने जा रही हैं।


अब देशद्रोह का मुकदमा तो चलना ही था। सन 1924 में एक भारतीय पत्र का संपादक ऐसा लिखे, यह तो अंग्रेजों की कल्पना में ही नहीं हो सकता था। उनकी नज़र में तो यह देशद्रोह था, इसलिए उन पर दफा 124-ए ताज़ीरात-हिन्द का एक मुकदमा जिला मजिस्ट्रेट श्री देसाई के न्यायालय में चलाया गया। कानूनी तौर पर तो तिवारी जी के वकील श्री शिवनाथ मिश्र थे लेकिन मुकदमे की पैरवी तथा जिरह खुद श्री तिवारी ज़ी ने ही की थी। तिवारी जी ने मिश्रा जी से कह रखा था कि वे उनकी बगल मे खड़े रहें और जब वे सलाह माँगें तो चुपके से सलाह दे दें। ऐसा हुआ भी। उनका लिखित बयान 72 पन्नों का था। खुद देसाई साहब भी बयान से प्रभावित थे किन्तु सरकार के आदेशों से मजबूर थे। उनको दो वर्षों की सज़ा सुनानी ही पड़ी।





 

Tuesday, June 26, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 41

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
पशन्ना आदि शिवराम तातिया के इतने सैनिकों का मुकाबला नही कर सकते थे। शिवराम तातिया ने इन अंग्रेजों से कहा वे बिठूर के नाना पेशवा धुधु पन्त के प्रति वफादार है और उनको पेशवा का आदेश है कि अंग्रेजों को कैद करके कानपुर लाया जाय। ग्रिफिथ, पसन्ना, उनकी पत्नी, पांच बच्चे और दो भतीजों को दो बैलगाड़ियाँ को बैठा कर ये सैनिक 18 जुलाई की शाम को कालपी पहुचे। शिवराम तातिया बहुत चालाक था उसकी मंशा थी कि अंग्रेज सराय में रुके हुए सैनिकों द्वारा मार दिए जाएँ। इससे उस पर कोई जुम्मेदारी भी नही आती और यदि बाद में कहीं अंग्रेज फिर से क्रांति को दबाने में सफल हो जाय तो उस पर कोई जुर्म न बने। असल में केशवराव और उसके दोनों पुत्र दो नाव में एक साथ पैर रखे थे। उनका मुख्य उद्देश्य जालौन का धन वसूल करके गुरसराय भेज कर अपना खजाना भरना था इस लिए वे अपने को क्रांतिकारियों के साथ होने का दिखावा करते थे। शिवराम तातिया को जब पता चला कि सराय में इन अंग्रेजों की हत्या इस कारण नहीं हो सकी क्योंकि दुकानदारों ने विरोध किया था तो वह उनको सजा देने के लिए उरई लौटा। यहाँ केशवराव द्वारा नियुक्त थानेदार ने शिवराम तातिया को सात नामों की सूची दी, जिन्होंने आग लगाने का विरोध किया था। उसको पता चला कि विरोध करने वालो की अगुवाई गणेश बजाज, जिसकी सराय में कपड़े की दुकान थी, ने की थी। शिवराम ने गणेश को पकडवा लिया। गणेश ने बड़ी खुशामद करके साठ रु० जुर्माना देकर अपनी जान बचाई। बाद का किस्सा भी यहीं पर जान लें। अंग्रेजों ने गणेश को अपना बड़ा हितैषी माना और जब फिर उनका जालौन पर अधिकार हो गया तब गणेश को बड़ा सम्मान दिया, उसका नाम दरबारियों की लिस्ट में शामिल किया गया। गणेश के मरने के बाद उसके पुत्र लल्ला को भी यह सम्मान मिला। उसका नाम भी दरबारियों की सूची में रहा।

कालपी में शिवराम ने इन अंग्रेजों को सराय में बंदी बना कर रखा और उनको कानपुर भेजने की तैयारी करने लगा। भेजने की तैयारियाँ हो ही रही थी तभी कानपुर में क्रांतिकारियों की पराजय, नाना के बिठूर पलायन और अंग्रेजों द्वारा कानपुर पर अधिकार कर लिए जाने की सूचना कालपी पहुँची। इधर बंदी रहते हुए पशन्ना ने एक हरकारे को रिश्वत देकर कानपुर एक पत्र भेजने में सफलता प्राप्त कर ली। कानपुर में कुख्यात जनरल नील को यह पत्र मिला। वहाँ से से जनरल नील ने एक कड़ा पत्र शिवराम तातिया के पास कालपी भेजा, जिसमें सभी अंग्रेजों के जानमाल की रक्षा और कानपुर सुरक्षित भेजने को कहा। केशवराव और उनके दोनों पुत्र दो नावों पर एक साथ सवारी करके जिस पक्ष की विजय हो उसकी तरफ रहने का फायदा उठाना चाहते थे। जैसे ही कानपुर में अंग्रेजों की जीत हुई और समाचार कालपी आया वैसे ही शिवराम का व्यवहार पशन्ना के प्रति एकदम से बदल कर मैत्रीपूर्ण हो गया।

22 जुलाई को 42 इन्फेंट्री के क्रांतिहारी सैनिक सागर से कालपी आए, उन्होंने कालपी में रह रहे अंग्रेजों के बारे में जानने की कोशिस की। शिवराम तातिया के लिए अब अंग्रेजों की जान बचाना बहुत आवश्यक था क्योंकि नील का पत्र उसको मिल चुका था। वह समझ रहा था कि कहीं इन सैनिकों ने यदि अंग्रेजों की हत्या कर दी तो फिर जनरल नील उसको नहीं छोड़ेगा। नील के कानपुर में किए गए अत्याचार की कहानियाँ उसको पता चल चुकी थीं। अत: उसने सभी अंग्रेजों को कालपी से 15 मील की दूरी पर चुर्खी नामक स्थान पर सुरक्षा के दृष्टिकोण से भेज दिया। अब आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि इनको चुर्खी ही क्यों भेजा तो आप को बतला दूँ कि चुर्खी में रानी लक्ष्मीबाई की सौतेली बहिन, मोरोपंत की पुत्री व्याही थी। मोरोपंत की ससुराल गुरसराय में थी। केशवराव गुरसराय के ही तो राजा थे अत: निकट सम्बन्धी थे। जब सागर के सैनिक कालपी से चले गए तब फिर 11 अगस्त को सभी अंग्रेजों को चुर्खी से कानपुर भेजने के लिए कालपी लाया गया। कालपी से अंग्रेजों को कानपुर भेजने के लिए बहुत अच्छी-खासी तैयारियां करनी थी सुरक्षा के लिहाज से और आराम के लिहाज से भी। 16 अगस्त को इन अंग्रेजों को कानपुर प्रस्थान करना था। इसी मध्य 15 अगस्त को नाना के समर्थक कुछ सैनिक कालपी आए। उन्होंने कालपी में मौजूद क्रान्तिकारी सैनिकों का मनोबल बढाने के लिए झूठ-मूठ प्रचारित कर दिया कि इलाहाबाद और कानपुर में फिर से क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया है। यह खबर बहुत बढा-चढा कर बतलाई गई थी, जिसको शिवराम तातिया ने सच मान लिया। वह फिर पलटी मार गया। उसने पशन्ना से कहा कि कानपुर में फिर से नाना साहब का अधिकार हो गया है और चूँकि वह नाना साहब का समर्थक है अत: अब वह उनको अंग्रेजों के पास नही भेजेगा और नाना के आदेशों का पालन करेगा। उसने सभी अंग्रेजों को फिर से हिरासत में लेकर चुर्खी भेज दिया। अगस्त का महीना समाप्त होने को आ रहा था, परन्तु पशन्ना आदि अभी भी कानपुर नहीं पहुचे थे। अत: जनरल नील ने पुन: एक कठोर पत्र इस विषय में केशवराव के पास भेजा। नील की ख्याति उसके द्वारा कानपुर में किए गए जघन्य अत्याचारों के कारण क्रूरतम अंग्रेज सेनानायक रूप में हो गई थी। केशवराव ने अब अंग्रेजों को तुरन्त कानपुर भेजने में ही खैरियत समझी। 31 अगस्त को फिर से सब अंग्रेजों को चुर्खी से कालपी लाया गया। केशवराव ने धन, बैलगाड़ियाँ और घोड़ों की व्यवस्था करके अपने सैनिकों की सुरक्षा में सब अंग्रेजों को कानपुर भेज दिया। डिप्टी कलेक्टर ग्रिफिथ, पशन्ना, उनकी पत्नी, पांच बच्चे तथा दो भतीजे 2 सितम्बर 1857 को सकुशल कानपुर पहुँचे।

आज इतना ही, बाकी अगली पोस्ट में।

बहुत से मित्र सन्दर्भ जानने के लिए कहते है उनके सूचनार्थ बतला दूँ कि क्रांति के समाप्त हो जाने पर पशन्ना कुछ समय के लिए जालौन में पोस्ट किए गए थे थे और उनसे यहाँ पर क्रांति कैसे हुई आदि के बारे में एक पूरी रिपोर्ट देने को कहा गया था। उन्होंने रिपोर्ट बना कर डिप्टी कमिशनर टरनन को दी जिसको उन्होंने सरकार को प्रेषित किया था। रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रिंटेड है और राज्य अभिलेखागार लखनऊ की लाइब्रेरी में देखी जा सकती है। रिपोर्ट का टाइटल है नरेटिव आफ इवेंट्स अटेंडिंग द आउटब्रेक आफ डिस्टर्बेंसेज एंड द रेस्टोरेशन आफ अथार्टी इन द डिस्ट्रिक्ट आफ जालौन,1857-59। धन्यवाद.. 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)
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Sunday, June 24, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 40

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 

17 जून 1857 को जालौन से भागने पर जालौन-ग्वालियर रोड पर पशन्ना और ग्रिफिथ को 53वीं नेटिव इन्फेंट्री की वह टुकड़ी मिली जो जालौन से खजाना लेकर ग्वालियर भेजी गई थी। यह टुकड़ी लौट रही थी मगर अब यह अंग्रेजों से बहुत नाराज थी। इसका कारण यह था कि जब यह टुकड़ी खजाना लेकर जाते समय रास्ते में ही थी तभी यहाँ पर उरई में सैनिकों ने बगावत कर दी थी इस कारण अंग्रेजी सरकार ने सिंधिया सरकार को सूचित किया कि जो टुकड़ी खजाना लेकर ग्वालियर भेजी गई है उससे खजाना ग्वालियर पहुचने के पहले ही रास्ते में अपने सैनिक भेज कर सिंधिया ले लें। इस कारण सिंधिया ने ग्वालियर से अपने सैनिक इन उरई वाली टुकड़ी से धन लेने के लिए भेज दिए। ग्वालियर में पदस्थ अंग्रेज अधिकारी यह भी नहीं चाहते थे कि कानपुर और उरई की किसी सैनिक टुकड़ी की मुलाकात ग्वालियर के सैनिकों से हो। सिंधिया के सैनिकों ने इस टुकड़ी से खजाना लेकर इन को वापस कर दिया। उरई की सैनिक टुकड़ी ने यह समझा कि अब उन पर अंग्रेज सैन्य अधिकारी विश्वास नहीं कर रहे हैं तभी उनसे रास्ते में ही धन ले लिया गया है। इस कारण उनको बहुत क्रोध हुआ और वे भी बगावती हो गए। उनने अपने सैनिक अधिकारी तामकिन्सन से कहा कहा कि अब वे उनकी नजरो से फौरन ही दूर हो जाएँ अब उनका कोई भी हुक्म नहीं माना जायगा। तामकिन्सन इतना डर गया कि रात में ही वह भाग निकला और खेत में जाकर छुप गया। वापस लौटती हुई यह टुकड़ी जब रास्ते में पशन्ना के दल को मिली तो वे खुश हुए कि सुरक्षा मिलेगी। मगर यहाँ तो अब बात उलटी थी। यह दल अब बगावती हो गया था उसने सब अंग्रेजों को कैद कर लिया। इनके पास जो भी धन था सब छीन लिया और कैदी की हालत में इनको लेकर जालौन पहुँचे। जालौन में पहुँच कर इन सैनिकों ने पशन्ना से कहा कि यदि वे दो हजार रुपए नगद दें तो नगदी छोड़ कर बाकी सब सामान लौटा देंगे। पशन्ना ने केशवराव के पुत्र शिवराम तातिया से कहा कि सरकारी कोष से दो हजार रु० देकर उनका सामान वापस दिलवाने की व्यवस्था करें परन्तु शिवराम ने इस पर कोई भी ध्यान नहीं दिया। इतना ही नहीं उसने सैनिकों को चौदह सौ रुपए देकर इन अंग्रेजो के सब सामान और घोड़े खुद ही अपने लिए खरीद लिए।

इधर उरई और कालपी में भी घटनाएं बहुत तेजी से घटी। कालपी के डिप्टी कलेक्टर शिव प्रसाद तो 6 जून से ही ब्राउन से कालपी छोड़ने की आज्ञा मांग रहे थे मगर कालपी जिले का प्रमुख स्थान था इस लिए ब्राउन कालपी पर हर हाल पर अधिकार रखना चाहते थे इस कारण उनको कालपी छोड़ने की आज्ञा नहीं दी गई थी। उरई में 17 जून को सभी अंग्रेजों को मार दिए जाने की सूचना कालपी में शिव प्रसाद को मिली। उरई में एक भी अंग्रेज अधिकारी नहीं रह गया था। उरई से काले खां का क्रान्तिकारी दस्ता किसी भी क्षण कालपी पहुंच सकता था। शिव प्रसाद को अब किसी से कुछ भी पूछना नहीं था। बिना किसी को कुछ बतलाए यमुना पार करके वह भाग गया।

18 जून को विद्रोही सैनिकों ने कालपी पहुँच कर शिव प्रसाद की खोज की परन्तु वह कहीं नहीं मिला। किसी ने शिव प्रसाद को कालपी से जाते हुए नहीं देखा था इससे क्रांतिकारियों ने समझा कि वह कालपी में ही कहीं छुपा होगा। इस कारण उसके बारे में सूचना देने वाले को पांच सौ रु० दिए जाने की घोषणा की गई। शिव प्रसाद कालपी में होते तो मिलते वे तो रात को ही कालपी से निकल लिए थे। विद्रोहियों ने उनके घर का सारा सामान लूट लिया। कालपी के थानेदार बसंतराव की किस्मत खराब थी, उनको भागने का मौका नहीं मिला। विद्रोहियों ने उनको कैद कर लिया और अपने साथ कानपुर ले गए। पता चलता है कि वे किसी प्रकार से बाद में कानपुर से क्रांतिकारियों के चंगुल से भाग निकले थे।

इधर 53वीं नेटिव इन्फेंट्री कंपनी अपने कैदियों पशन्ना, ग्रिफिथ और उनके परिवार के साथ 19 जून को उरई आई। ये अंग्रेज अधिकारी सौभाग्यशाली थे क्योंकि रिसलेदार काले खां का क्रान्तिकारी दल 18 को ही उरई से चला गया था वर्ना इन सबके मारे जाने में कोई सन्देह नहीं था क्योंकि काले खां का नियम था कि किसी भी अंग्रेज को जिन्दा नही छोडना है। 53 नेटिव इन्फेंट्री ने भी इन अंग्रेजों को इनके भाग्य के भरोसे छोड़ा और कानपुर प्रस्थान कर गई। इन अंग्रेजों का साथ देने वाला उरई में कोई नहीं था अत: इन्होंने कदौरा के नवाब या चरखारी के राजा रतन सिंह के पास जाने की सोची। उरई से दक्षिण की राह पकड़ी लेकिन रास्ते में ही गुरसराय के राज के पुत्र शिवराम तातिया के सैनिकों द्वारा पकड़ लिए गए। उरई लाकर इन सबको शिवराम तातिया के आदेश से उरई की संराय में रख कर फर बैठा दिया गया। अगले दिन ग्वालियर कन्टेनजेंट की चार पलटन और 14वीं रेगुलर सवारों का एक दल उरई आया। शिवराम के सैनिकों ने बंदी अंग्रेज अधिकारीयों को इन सैनिकों के सामने पेश किया। सैनिकों का नायक दयालु स्वभाव का था। उसने कहा कि जब इनको कैद करने वाले सैनिकों ने नही मारा, हम लोग ही क्यों मारे। इनको भाग्य के सहारे उरई में छोड़ कर वे सब भी कानपुर प्रस्थान कर गए। पशन्ना और ग्रिफिथ के पास जाने के लिए कोई भी सुरक्षित स्थान नही था, अत वे सब उरई में सराय में ही रुके रहे। लगभग तीन सप्ताह तक ये लोग सराय में ही रुके रहे। 14 जुलाई को क्रान्तिकारी सैनिकों की एक टुकड़ी उरई आई और इसी सराय में रुकी।

14 जुलाई को क्रान्तिकारी सैनिकों की जो टुकड़ी उरई में आकर सराय में रुकी थी। यह सराय उरई में आजकल के गोपालगंज के पास ही थी। अभी भी यह इलाका सराय के नाम से जाना जाता है। बहरहाल, क्रांतिकारी सैनिकों को सुबह 15 तारीख को पशन्ना आदि अंग्रेजों के इसी सराय में रुके होने के बारे में पता चला। इन सैनिकों ने इन अंग्रेजों को मारने का प्रयास किया। सहादत खां और मिया खां नाम के सैनिकों ने पूरा प्रयास कर लिया अंग्रेजों ने दरवाजा अन्दर से बंद कर रखा था इस कारण सफलता नहीं मिली। अब इन लोगों ने आग लगा कर मारने की सोची। अब तक सराय के पास काफी भीड़ लग गई थी। सराय के पास छोटा-मोटा बाजार भी था। इन दुकानदारों को लगा कि आग लगाने से हो सकता है कि वह फैल जाय और उनकी दुकानों को भी आग अपनी लपेट में ले ले क्योंकि दुकानें खपड़ेल की कच्ची ही थीं। इस पर इन दुकानदारों ने आग लगाने का विरोध किया मगर सैनिक आग लगाने को आमादा थे। विरोध करने वालों में गणेश बजाज प्रमुख रूप से आगे था। गणेश ने जब देखा कि इन सैनिकों पर कहने-सुनने का कोई असर नहीं हो रहा है तब उसने सराय के और दुकानदारों को लेकर इन सैनिकों पर पत्थरों की बौछार शुरू कर दी और लाठियां लेकर उन पर पिल पड़े। इससे सैनिकों को सराय से भागने को मजबूर हो गए। इस घटना के कारण एक बार फिर इन अंग्रेजों की जान बच गई और ये सराय में रुके रहे। 17 जुलाई को शिवराम तातिया अपने 300 सैनिकों के साथ कालपी से उरई आया औए इन सब अंग्रेजों को हिरासत में ले लिया। 


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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)
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