Showing posts with label बुन्देली. Show all posts
Showing posts with label बुन्देली. Show all posts

Monday, June 5, 2023

बैरागढ़ की माँ शारदा शक्ति पीठ और आल्हा की सांग

उत्तर प्रदेश के बैरागढ़ गाँव में स्थित मंदिर धार्मिकता, सिद्धस्थल होने के कारण देश भर में विख्यात है. माँ शारदा देवी का मन्दिर जालौन जिले के उरई मुख्यालय से लगभग तीस किलोमीटर दूर ग्राम बैरागढ़ में स्थित है. इस मंदिर में ज्ञान की देवी माँ शारदा की अष्टभुजी मूर्ति स्थापित है. कहते हैं कि इस शक्ति पीठ की स्थापना चन्देलकालीन राजा टोडलमल द्वारा ग्यारहवीं सदी में कराई गई थी किन्तु माँ शारदा की मूर्ति हस्तनिर्मित नहीं है. किवदंती है कि गाँव में स्थित एक कुंड से माँ शारदा स्वयं प्रकट हुई थीं, इसीलिए इस स्थान को शारदा देवी सिद्ध पीठ कहा जाता है. यह स्थल सुवेदा ऋषि की तपोस्थली रही है और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ शारदा कुंड से प्रकट हुई थीं. वह कुंड वर्तमान में इस मंदिर के पीछे बना हुआ है. इस शक्ति पीठ का दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के अनुसार माँ शारदा की यह मूर्ति पूरे दिन में तीन रूपों में दिखाई देती है. प्रातःकाल यह मूर्ति एक कन्या के रूप में दिखती है, दोपहर में इस मूर्ति में युवती का रूप नजर आता है और सायंकाल इसी मूर्ति में माँ का रूप दृष्टिगोचर होता है.

 

बैरागढ़ स्थित माँ शारदा शक्ति पीठ 


माँ शारदा की प्रतिमा 

सम्पूर्ण देश में बैरागढ़ का यह मंदिर अपनी धार्मिकता और सिद्धपीठ होने के कारण प्रसिद्द है तो यह अपनी ऐतिहासिकता के लिए भी विख्यात है. यह स्थल बुन्देलखण्ड के अप्रतिम वीर योद्धा आल्हा और पृथ्वीराज चौहान के युद्ध का साक्षी है. आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो महोबा के दशरथपुरवा गाँव में जन्मे थे. दोनों भाई बचपन से ही अत्यंत वीर और पराक्रमी थे. आल्हा-ऊदल राजा परमाल के सेनापति थे. सन 1181 में उरई के राजा माहिल की कूटनीति पर राजा परमाल ने आल्हा-ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया. जिसके चलते दोनों भाइयों ने कन्नौज के राजा लाखन राणा के यहाँ शरण ली.

 

पृथ्वीराज चौहान को जब इस बात की खबर लगी तो उसे लगा कि आल्हा-ऊदल से विहीन सेना को आसानी से जीता जा सकता है. बुन्देलखण्ड को जीतने के उद्देश्य से पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया. कीरत सागर मैदान में चल रहे युद्ध रोकने के लिए पृथ्वीराज ने राजा परमाल से उनकी बेटी चंद्रावल, पारस पथरी और नौलखा हार सौंपने की शर्त रखी. यह शर्त मानना पृथ्वीराज की गुलामी स्वीकारने जैसा था. राजा परमाल की पत्नी मल्हना ने जब यह खबर आल्हा, ऊदल के पास कन्नौज पहुँचाई तो वे दोनों भाई और कन्नौज नरेश ने साधुवेश में कीरत सागर के मैदान में पहुँच कर पृथ्वीराज की सेना को पराजित कर पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया.


आल्हा और ऊदल माँ शारदा के उपासक थे. जिसमें आल्हा को माँ शारदा का वरदान था कि उन्हें युद्ध में कोई नहीं हरा पायेगा. कहा जाता है कि आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान के बीच 52 बार युद्ध हुआ, जिसमें हर युद्ध में पृथ्वीराज की बुरी तरह से हार हुई. बैरागढ़ का युद्ध इनके बीच का अंतिम युद्ध कहा जाता है. इस युद्ध में ऊदल को वीरगति प्राप्त हुई और आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को पुनः जीवनदान देते हुए वैराग्य ले लिया. इसी कारण से इस स्थान को बैरागढ़ के नाम से जाना जाता है.

 

बैरागढ़ में हुई भीषण लड़ाई में आल्हा के भाई ऊदल को पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडराय ने धोखे से मार दिया. अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर आल्हा क्रोध से भर उठे और पृथ्वीराज की सेना पर कहर बनकर टूट पड़े. लगभग एक घंटे के भीषण युद्ध के बाद आल्हा ने पृथ्वीराज को हरा दिया. उसके बाद आल्हा ने विजय पश्चात् माँ शारदा से वरदान स्वरूप प्राप्त सांग को माँ शारदा के चरणों के पास गाड़ दिया. कहते है कि आल्हा ने उस सांग को जमीन से बाहर निकालने की चुनौती पृथ्वीराज चौहान को दी. पृथ्वीराज उस सांग को जमीन से बाहर न निकाल सके. इसके बाद आल्हा ने सांग को ऊपर से टेढ़ा करके उसे सीधा करने की चुनौती दी. इसे भी पृथ्वीराज पूरा न कर सके. पृथ्वीराज चौहान को बुरी तरह से परास्त करने के बाद भी अपने गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया. इसके बाद आल्हा ने बैराग ले लिया और माँ शारदा की भक्ति में लीन हो गए. आल्हा के द्वारा माँ शारदा के चरणों के नजदीक गाड़ी हुई सांग आज भी मन्दिर के मठ के ऊपर निकली दिखाई देती है. ये सांग 30 फिट से भी अधिक ऊँची है और लगभग इतनी ही जमीन में गड़ी है.

 

मंदिर के मठ पर गड़ी आल्हा की सांग 

मन्दिर में आल्हा द्वारा गाड़ी गई सांग इसकी प्राचीनता को दर्शाता है. आज भी बैरागढ़ में माँ शारदा के मंदिर में मान्यता है कि हर रात दोनों भाई आल्हा और ऊदल आराधना करते हैं. कहा जाता है कि रात को सफाई के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं लेकिन सुबह जब कपाट खोले जाते हैं तो वहाँ पूजा करने के प्रमाण मिलते हैं. बैरागढ़ के अलावा माँ शारदा शक्ति पीठ मध्य प्रदेश के सतना के नजदीक मैहर में स्थित है.  

 


मंदिर प्रांगण में बना कुंड, जहाँ से माँ शारदा स्वयं प्रकट हुईं थीं 

++++++++++++

(सभी चित्र लेखक और उसके भाई डॉ. हर्षेन्द्र सिंह सेंगर द्वारा दिनांक 02-06-2023 को खींचे गए हैं.)

Wednesday, August 9, 2017

शौर्य बलिदान की गाथा कहता लोकपर्व कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.

महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

Monday, March 7, 2016

बुन्देली भासा में पुस्तक की तैयारी


बुन्देली भासा में एक किताब निकारबे को बिचार बनो है. जा किताब में लेख हुईयें, जोनमें अपएँ बुन्देलखण्ड के बारे में, बुन्देलखण्ड की कला, संस्कृति, सभ्यता, बोली आदि के बारे में बताओ गओ होए, बेई छपहैं. सो जाके लाने आप सबई जनन को सहयोग चईये है.मदद करियो सबई जनें.

जिनें-जिनें जानकारी चईये होए सो मेल कर दईयो. 
bundeli.org@gmail.com

Tuesday, October 20, 2015

बुन्देली लोकोत्सव - टेसू और झिंझिया

बुन्देलखण्ड क्षेत्र अपने आन-बान-शान के लिए जितना प्रसिद्द है उतनी ही प्रसिद्धि उसको यहाँ की लोकसंस्कृति के कारण प्राप्त है. यहाँ की लोककलाओं, लोकपर्वों, लोकविधाओं आदि में अनेकानेक गतिविधियाँ संचालित होती हैं.लोक को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानने के कारण ही यहाँ जन्मे लाला हरदौल अपने व्यक्तित्व, कृतित्व के कारण लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं. लोक को महत्त्व देने के कारण ही यहाँ मामुलिया, टेसू, झिंझिया, नौरता, सुआटा आदि के साथ-साथ अन्य कई लोकपर्वों का आयोजन होता रहता है. समूचा बुन्देलखण्ड क्षेत्र लोक की विविधता और जीवन्तता के कारण विशेष स्थान बनाये हुए है. इसी लोक परम्परा में टेसू भी शामिल है जो किसी एक वीर पुरुष को परिभाषित करता है. इस वीर पुरुष को याद करते हुए एक गीत गाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में टेसू गीत कहा जाता है. हालाँकि टेसू के बारे में प्रमाणिक रूप से किसी धर्मग्रन्थ में अथवा किसी ऐतिहासिक ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता है. वाचिक परंपरा के कारण टेसू एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता आ रहा है.  

             भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषता ये रही है कि यहाँ धार्मिक आयोजनों, अनुष्ठानों के द्वारा किसी न किसी तरह की सीख सबको देने का प्रयास किया जाता है. सहयोगी भावना के साथ, सामंजस्य के साथ कैसे एक-दूसरे के सहयोग से कोई कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया जा सकता है, ये सहजता से सीखने को मिल जाता है. लोक संस्कृति में भी इसी तरह के संस्कार देखने को मिलते हैं. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आयोजित किये जाने वाला टेसू लोकपर्व हो, झिंझिया हो, सुआटा हो अथवा मामुलिया, सभी में बच्चों की सहभागिता रहती है. ऐसे आयोजनों के द्वारा बच्चों में सहयोग की भावना का विकास होता है, समन्वय की भावना जन्मती है और खेल-खेल में अपनी लोक संस्कृति को जानने-समझने का अवसर भी मिलता है. टेसू, झिंझिया, सुआटा, नौरता, मामुलिया आदि का आयोजन की अपनी ही विशेषता है. ये सारे लोक आयोजन एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, जो लगभग एक माह तक आयोजित होते रहते हैं. ये आयोजन कई चरणों में संपन्न होता है. भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन पूर्णिमा , जिसे शारदीय पूर्णिमा भी कहा जाता है, तक पाँच चरणों में इस आयोजन को संपन्न किया जाता है. बुन्देलखण्ड में किशोर-किशोरियों द्वारा इस क्रियात्मक विधान का अपना महत्त्व माना जाता है. मामुलिया से आरम्भ होकर ये आयोजन  नौरता, टेसू, झिंझिया से गुजरता हुआ अंत में टेसू द्वारा सुआटा को मारकर झिंझिया से विवाह करने पर समाप्त होता है.

मामुलिया किशोरियों का खेल है जिसे भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर कृष्ण आमावस्या तक खेला जाता है. इस लोक आयोजन को दो भागों में किशोरियों, लड़कियों द्वारा पूरा किया जाता है. उनके द्वारा किसी दीवार पर पूर्वाभिमुख किये हुए एक आयाताकार आलेख बनाया जाता है. इसको बाहरी साज-सज्जा के साथ अंदर ऊपर की ओर दोनों कोने में सूर्य तथा चन्द्र द्वारा अलंकृत किया जाता है. सांयकाल किशोरी बालिकायें झुण्ड बनाकर एकत्र होती हैं और किसी काँटेदार टहनी को फूलों से सजा गीत गाती हुई गली-गली घूमती हैं. इसी टहनी को मामुलिया कहा जाता है, जिसे सूर्यास्त के बाद किसी जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है. ऐसा करने के बाद बालिकाएँ स्व-निर्मित आयताकार आलेख के पास एकत्र होती हैं. इस आलेख पर गोबर की थाप्पियाँ चिपकाना, लोकगीत, भजन आदि गाना इन लड़कियों द्वारा किया जाता है. ऐसा प्रतिदिन किया जाता है.

इसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तक नवरात्रि के आयोजन में एक खेल नौरता का आयोजन किया जाता है. इसके अंतर्गत सुआटा नामक राक्षस की प्रतिमा को गोबर से बनाया जाता है. इस प्रतिमा को रंगों, कौड़ियों आदि से अलंकृत किया जाता है. बुन्देलखण्ड क्षेत्र में ऐसी किंवदन्ती है कि यही सुआटा राक्षस लड़कियों, किशोरियों को परेशान करता था. इसी के द्वारा झिंझिया राजकुमारी का अपहरण कर लिया गया था. बाद में वीर राजकुमार टेसू सुआटा को मार डालता है तथा झिंझिया को मुक्त कर उससे विवाह करता है. इसी के साथ मान्यता है कि सुआटा को अविवाहित बालिकाओं द्वारा खेला जाता है और जो लडकियाँ इसे खेलती है उन्हें विवाहोपरान्त इससे मुक्ति लेनी होती है. इसके लिए भी एक लोक आयोजन संपन्न किया जाता है. इसमें विवाह के बाद सर्वप्रथम पड़ने वाले इस लोकपर्व में नवमी के दिन सुआटा उजाया जाता है.

इस लोक आयोजन में मामुलिया, सुआटा के पश्चात टेसू और झिंझिया का खेल होता है. टेसू आश्विन शुक्ल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक तथा नवमी से चतुर्दशी तक झिंझिया खेली जाती है. टेसू का खेल बालकों द्वारा तथा झिंझिया का खेल बालिकाओं द्वारा खेला जाता है. टेसू बाँस की तीन डंडियों से बना एक ढाँचा होता है, जिसे रंग-बिरंगे कागजों से ढँक दिया जाता है, सिर पर मुकुट और हाथ में ढाल-तलवार से इसको सजाया जाता है.  टेसू के खेल में लड़के उस रंग-बिरंगे ढाँचे को लेकर घर-घर जाते हैं और टेसू-गीत गाते हुए धन की माँग करते हैं. बालकों द्वारा गाये जाने वाले ये गीत विनोदी होते हैं और कई बार महज तुकबंदी के रूप में प्रयुक्त होते हैं. अनर्थक, देशज शब्दों का प्रयोग कर इन बालकों का उद्देश्य गीत को लय देना और हास्य प्रदान करके धन की प्राप्ति करना होता है. इसके चंद उदाहरण दृष्टव्य हैं.

टेसू आये वानवीर
हाथ लिए सोने का तीर
एक तीर से मार दिया
राजा से व्यवहार किया
राजा बोले हुर्र के,
दाढ़ी लगी ओके की,
लग गई तिलोक की,
तीन तिलोका कहाँ चले,
अत्ती के पावन,
अत्ती मेरा हींसा,
चार का चालीसा,
चालीसा की धारें,
लग गई किनारे,
नौ मन पीसें, दस मन खाय,
घर-घर टेसू माँगन जाय,
पड़वा बोले आँय.

इसी तरह से कई बार लड़के दानदाता के सामने कुछ इस तरह से अपनी बात रखते हैं-

टेसू अगड़ करैं, टेसू झगड़ करैं,
टेसू लेई के करैं.

और कहीं-कहीं ऐसे भी कि-

मेरा टेसू यहीं अड़ा, खाने को माँगे दही बड़ा,
दही बड़े में पन्नी, टेसू माँगे अठन्नी.
इस तरह से अनेक निरर्थक बातों-गीतों के द्वारा बालकों का टेसू आयोजन चलता रहता है.

लड़कियों द्वारा झिंझिया के स्वरूप हेतु मिट्टी का छोटा घड़ा लिया जाता है, जिसमें अनेक छेद किये जाते हैं. इसके अंदर अनाज तथा उसके ऊपर जलता दीपक रख दिया जाता है. इसे ही झिंझिया कहा जाता है. इसमें बालिकाएँ ‘झांझी से झांझी तेरो ब्याह रचाओं’ गीत गाती हुई नृत्य भी करती हैं. झिंझिया-नृत्य में बालिकाएँ गोलाकार खड़ी हो जाती हैं और केंद्र में एक बालिका नृत्य करती है. वृत्ताकार खड़ी बालिकाएँ तालियों की थाप के द्वारा नृत्य को गति प्रदान करती हैं. इसमें सभी बालिकाओं को बारी-बारी से एक-एक करके केंद्र में आकर नृत्य करना होता है. इस नृत्य की विशेष बात ये होती है कि केंद्र में नृत्य करती बालिका अपने सिर पर रखी हुई झिंझिया का संतुलन बनाये रहती है. यह नृत्य टेसू-झिंझिया विवाह के समय भी होता है जो बालिकाओं की प्रसन्नता को दर्शाता है. इस घड़े को लेकर किशोरियों द्वारा घर-घर जाकर दानस्वरूप धन अथवा या अनाज की माँग करती हैं. कई जगह बालिकाएँ अन्य गीत गाते हुए दान चाहती हैं-

नये कुआँ में दिया जलत है, कमल फूल उतराए सुगना.
इन गलियन से ससुरा निकले, ससुरा प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने ससुर को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.
इन गलियन से जेठवा निकले, जेठवा प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने जेठ को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.
इन गलियन से सजना निकले, सहना प्यासे जाए सुगना, जाए सुगना.
अपने सजन को पानी पियाओ सुगना, पियाओ सुगना.


इस लोक आयोजन के अंत में शारदीय पूर्णिमा को टेसू और झिंझिया का विवाह संपन्न होता है. उससे पहले लड़कियों द्वारा पूर्वाभिमुख दीवार पर बनाये आलेख और सुआटा राक्षस की प्रतिमा को बालकों द्वारा खंडित किया जाता है. उसके अंग-प्रत्यंगों को निकाल कर इधर-उधर फेंक दिया जाता है, जो इस बात का सूचक होता है कि टेसू वीर द्वारा सुआटा राक्षस का अंत कर झिंझिया को मुक्त करा लिया गया है. इसके पश्चात पूरे धूमधाम से लड़के-लडकियाँ मिलकर टेसू और झिंझिया का विवाह करवाते हैं. इस लोक आयोजन में विशेष बात ये होती है कि इसमें अमीर-गरीब का भेद नहीं होता है. इस खेल में सभी घरों के लड़के-लडकियाँ शामिल होकर एकसाथ खेलते हैं और धन या अनाज माँगने की प्रक्रिया किसी तरह की भिक्षा न होकर अधिकार जैसा होता है. बुन्देलखण्ड के ग्रामीण अंचलों और छोटे कस्बों में आज भी ये लोक आयोजन पूरे उत्साह, धूमधाम से मनाया जाता है. 

Friday, February 6, 2015

बुन्देलखण्ड के किसानन की समस्या



जा बात हम सबई जनन बहुत पैले से जानत हैं कि हमाओ देस किरसी प्रधान रहो है। इतै की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ो हिस्सा जैई किसान भइयन की मेहनत से उपजी फसल से पूरो होत है। जई खेती-किसानी के कारण से देस को बहुत बड़ो मानस जामें लगो है और जई से अपनो पेट पाल रहो है। जऊ सबके बाद हमाए इतै के किसान भइयन को बहुतई बुरी तरह से परेसान होने पड़ रओ है। किसान भइयन के परेसान होबे की बातें अकेले अपएँ बुन्देलखण्ड में नईं हो रईं हैं बल्कि देखो जाये तो देस के बहुतन राज्य में ऐसो हो रओ है। सबईं जगह के हालात अलग-अलग हैं और इनई के मारे अपएँ किसान भइयन को समस्याएँ आ जात हैंगीं।
.
अब अपएँ बुन्देलखण्ड को देख लेओ, इतै की माटी जैसी उत्तम माटी पूरे देस में सायतई कहूँ और मिले। इतै की फसलऊ बहुत अच्छी होत है, जऊ के बाद इतै के किसान भइयन को उनकी फसल को पूरो-पूरो दाम नईं मिल पात है। जईसे बे बहुतई बार परेसान हो जात हैं और जई कारण से उनको मन खेती-किसानी से उचटन लगत है। किसान भइया खती-किसानी छोड़ के, अपओं गाँओ छोड़ के जान लगत हैं, कहूँ और कछू और काम करबै के लाने। देखो जाये तो अपएँ बुन्देलखण्ड में खेती के पिछड़बे के बहुतई-बहुत कारण दिखत हैं। एक तो इतै को मौसम बहुतई गरम है, जाके मारे किसान भइया पूरी साल भर खेतन में काम नईं कर पात हैं; जाके अलाबा इतै अपईं जोतन को आकारऊ लगातार छोटो होत जा रओ है, जा चक्कर में ढंग से कौनऊ फसल होत नईंयाँ। देखो जाये तो जोतन के छोटे हाबे के मारे अपएँ इतै के किसान नकदी फसलन को उगाबै से बचत हैं। जऊ के संगे-संगे एक और बहुतई बड़ी समस्या देखबे में आई है और बा है फसल को सही दाम पै न बिकबे की।
.
जा समस्या जासे है कि अपएँ बुन्देलखण्ड में मंडियाँ गाँओं से दूर सहरन में बनी हैं और उतै तक जाबे के लाने सड़कन की बिबस्था अच्छी नईंयाँ। सड़कें बहुतई खराब हैं, तऊ पै लूटमार को डर बनो रहात है। सबई किसान भइयन के पास अपईं फसल सहर की मंडियन में भेजबे के लाने कौनऊ उन्नत साधनऊ नईंयाँ। जाकै लाने बे सिगरे या तो कौनऊ दूसरे पे निरभर रहत हैं या फिर अपईं बैलागाड़ी को सहारा लेत हैं। अपईं फसल को इकट्ठो रोके रखबे के लाने उनके पास ठौर-ठिकाना तौ हौत नईंयाँ, जामें सुरच्छित रखके बे मौका पड़बै पे फसल बेंच सकें। खुले में धरी उनकी फसल कबहूँ आँधी-पानी से बरबाद होत है तो कबहुँ जानवर, चूहा, कीड़ा-मकोड़ा खराब कर जात हैं। जैई सब ठठकरमन से बचबै के लाने गाँओं के छोटे-छोटे किसान भइया अपईं फसल को गाँओं के या उतईं आसपास के कौनऊ बड़े कास्तकार को बेच देत हैं। जई कै मारे उनैं उनके मन के दाम नईं मिल पात हैं।
.
एक तो ऊबड़-खाबड़ रस्तन पै चलकै मंडियन तक पहुँचबोई बहुत मुस्किल को काम होत है, कौनऊ छोटो किसान यदि हिम्मत करके उतै पहुँचई जात है तो उतै पहले से टहल रहे दलाल बिकबे के लाने आई फसल पै गीधन से टूट पड़त हैं। समय से फसल बिक जाये, सही से बा फसल को दाम मिल जाये जाके लाने किसान भइया बहुतई बार इन दलालन के चक्कर में फँस जात हैं। जऊ कारण से उनैं उनकी फसल को सही दाम नईं मिल पात है। यदि कैसंेऊ करके किसान इन दलालन से बच जाये तो मंडियन में बैठे बड़े-बड़े आढ़तिया उनैं लूटबे के लाने तैयार रहत हैं। उनऊ को जा अच्छे से मालूम होत है कि इन किसानन को अभै बापस गाँओ जाने है, इतै सहर में उनके रुकबे को कौनऊ ठौर नईंयाँ। जाकै मारे बे आढ़तियऊ औने-पौने दामन पै किसानन की फसल को खरीदन की बात करत हैं। किसानऊ अपईं परेसानी के मारे, किसानी के काम में लई भई उधारी को चुकाबे के लाने, घर को जरूरी सामान लैबे के लाने फसल कम दामन में बेंचबे को मजबूर हो जात है।
.
सरकार को, स्थानीय पिरसासन को जा बिबस्था में सुधार करबे की जरूरत है। सहरन की बड़ी-बड़ी मंडियन के संगै-संगै गाँओन के आसपास कछु छोटी-छोटी मंडियन को खुलबान चहिए। जासै कि छोटे किसानन  को परेसान न होन पड़े। पिरसासन जऊ बात को ध्यान रखे कि मंडियन के आसपास दलालन को टहलबो न होए, मंडियन में फसल बेचत समय इन किसानन को कोऊ परेसान न करत होए। जाकै अलाबा गाँओं-जुहार में फसल को सुरच्छित रखबै की बिबस्था भी बाको करन चहिए, जासै कि कछु समस्या होबै की स्थिति में उतै के किसान अपईं फसल को सुरच्छित रख सकें। सड़कन को सही करबे को काम, उनैं सही रखबे को काम, बरसात के बाद उनमें हो जान बाले गड्ढन को भरबै को इंतजाम आदि को समय से करान चहिए। जाके संगै-संगै पिरसासन को इन सड़कन पै सुरच्छा बिबस्था सही करबै को काम करान चहिए, जासै कि उतै पे अपईं फसल ले के जात में किसानन को लूटपाट का डर-भय न होए। यदि सरकार या फिर पिरसासन इत्तोई थोड़ो सो काम करन लगे और किसानन की दिक्कतन को समझन लगे तो न सही सिगरै पर बहुतन किसानन को लाभ होन लगहै। एकई बार कौनऊ किसान को बाकी फसल को सही दाम मिल गओ तो बाकी देखादेखी औरऊ किसान अपएँ खेतन में मन से काम करन लगहैं। जासे किसानन को गाँओं छोड़बो रुकहै और उनको कछू न कछू और बिकास होएहै। अपएँ किसान भइयनऊ को जाकै लाने इकट्ठो होके पिरसासन से मिलबे की, बाके ऊपर जोर दिखाबे की जरूरत है।

ये लेख प्रवासनामा के १६ जनवरी २०१५ के अंक में प्रकाशित हुआ.

Tuesday, December 30, 2014

फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद



फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
-------------------------
जा बहुतई बड़ी बिडम्बना कही जैहे के जोन बुन्देलखण्ड कभऊँ वीरन से खाली नईं रही, जिते पे दूसरे की रच्छा के लाने जान देबो गरब की बात समझी जात हती, जिते दुसमन की मुड़ी काट लेबो हँसी-मजाक जैसो रहत हतो उते के किसान भैया आत्महत्या अब जैसे कदमन को उठान लगे हैं. आये दिना अब सुनबे को मिलन लगो है कि कभऊँ कौनऊ किसान ने फांसी को फंदा लगा लओ, कभऊँ कितऊँ और के किसान भैया ने आत्महत्या कर लई. जा बहुतई ख़राब हालत दिख रई है और जाके पीछे के कारन ढूंडबे को काम कोऊ नईं कर रओ है. गाओं-दिहात के लोग सरकार को दोस लगान लगत हैं और सरकार किसान भैयन को दोसी बताउत है. ऐसोई होत रैहे तो कौन कछू लाभ निकरहै. सबसे पहलूँ तो हम सबई जनन को मिल बैठ के काम करबे की, मेलजोल बढ़ाबे की जरूरत है. इतै कछुएक समय से देखबे को मिल रओ है के अपएं सिगरे गाओं-दिहात एकदम से सहर बनत जा रए हैं. इतै के लोग पढ़-लिख के सहर की तरह भगन में लगे हैं और जो कछु थोड़े-बहुत गाओंन में रह रए हैं बेऊ सहर बालिन जैसो ब्योहार करन लगे हैं. आपस में मिल-बैठ के कोऊ बात करबो नईं चाहत है, एक-दूसरे की राम-जुहार भये कहो महीनन निकर जाए, एक-दूसरे के सुख-दुःख को कौनऊ ख्यालई नईयाँ. ऐसो थोड़ेई होत रहो हतो गाओंन में और ऐसोई होबो अच्छी बात नईयाँ. 
.
नेक जापे बिचार करियो के कौनऊ किसान भैया पे संकट आ गओ है, कौनऊ मुस्किल आन पड़ी है, कोऊ परेसान कर रओ है तो बो का करहै. या तो अकेलेई संकटन से निपटे या फिर अकेले लड़-लड़ के मर जैहे. समस्या सबई पे आत हैगी पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के बाए अकेले छोड़ दओ जाए. आजकल खेती-किसानी बैसेईं बहुतईं कठिन हो गई हैगी, कभऊँ पानी कम बरसबे को संकट तो कभऊँ जादा बरसबे से फसल ख़राब होबे को डर; कभऊँ फसल को दाम सही न मिलबे को रोबो तो कभऊँ बैंकन को रोबो. अब ऐसे में यदि सबई जनें संगे होयें, मिल-बैठ के कछु समाधान सोचो जाए तो ऐसो नईयाँ के कौनऊ हल न निकरे. एक बात तो सबई जनन को मानने पड़है कि जा देस में, जा समाज में किसानी करबो सबसे मुस्किल काम हैगो और उत्तो लाभऊ नईं रह गओ, जित्ती के बामें मेहनत लग जात है, लागत लग जात है, पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के सिगरे किसानियई बंद कर दें. ऐसोई यदि सीमा पे लगबे बारे बीर जुआन सोचन लगें तो का हुईए?
.
जाके लाने गाओं के किसान भैया एक-दो बातन को ख्याल रख लें तो सियात कछु दिक्कत कम होबे. एक तो हम गाओं के लोगन को जे सहर बालिन की फिजूल की नक़ल करबो बंद कर देन चइए, कायेसे कि जासे मिलत कछु नईयाँ, नुकसान ऊपर से हो जात है. जे सहर की नक़ल करके जाने कौन-कौन से खर्चा अब सिगरे गाओंन में होन लगे हैं. जौन काम में तनक सो खर्चा आत हतो अब बामें मार तामझाम करो जान लगो है. जेई दिखाबे के चक्कर में छोटे किसान भैया गाओं के बड़े किसानन से, जमींदारन से, आसपास के महाजनन से, अपने रिश्तेदारन से, बैंकन से कर्जा ले लेत हैं. एक तो मौसम के मारे, फसल को दाम सही से न मिल पाबे के मारे किसानन को कछु लाभ हो नईं पा रओ, तापे जो कर्जा..... सोई किसान भैया परेसान रहन लगत हैं. अपने जान-पहचान बालिन से, बैंकन से कर्जा लेबो बुरी बात नईयाँ पर बाको गलत इस्तेमाल बुरो है. और आजकल जोई जादा हों लगो है. बस एक जोई काम सही से करबे की ठान लेओ, फिर देखो जाने कित्ती समस्याएं अपएं आप दूर खड़ी दिखाई दैहें. चलो, भैया उरें, अभे के लाने इत्तियई बात, बाकी थोड़ी-मोरी और कर लई जैहे अगली बार. तब तक के लाने राम-राम.

Saturday, August 3, 2013

बुन्देली लोकगीतों की परम्परा और बन्नी गीत

बुन्देली लोकगीतों की परम्परा और बन्नी गीत

          भारतीय हिन्दू पद्वति में विवाह संस्कार अपनी पावनता के कारण महत्ता प्राप्त किये है। विवाह की स्वीकार्यता और लोकमानस का हर्ष, उल्लास में चहकना खुशी का और बढ़ाता है। संस्कारों के अवसर पर खुशी के प्रदर्शन हेतु हाथ स्वतः ही किसी ध्वनि का प्रस्फोट करने लगते हैं; पैर स्वतः ही थिरकना शुरू कर देते हैं और मुख से स्वाभाविक रूप से गीतों की उत्पत्ति होने लगती है। स्वाभाविक रूप से प्रकट यही गीत जनमानस के मध्य लोकगीतों के रूप में प्रचलित रहते हैं। लोकगीतों में अद्भुत प्रकार की जीवन्तता होती है। जीवन की रागात्मक प्रवृत्ति का सांगोपांग चित्रण लोकगीतों में होता है।
.
          लोकगीत किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं होते हैं, ये पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः ही जनमानस के मध्य अपनी उपस्थिति बनाये रखते हैं। लोककी पावनता को अक्षुण्य रूप से ये गीत अपने में समाहित कर जीवन्त रखते हैं। वर्तमान में समाज में लोकको अंग्रेजी के फोकका पर्याय स्वीकार कर इसका गलत अर्थ निकाला जाता है, जबकि सत्यता यह नहीं है। लोकका ग्रामीण स्वरूप इसी विभ्रम के कारण उत्पन्न हुआ है। लोककी पावनता को त्रिलोक-पृथ्वी लोक, आकाश लोक, पाताल लोक-के माध्यम से आसानी से समझा जा सकता है। इसी पावनता के कारण लोकगीतों में सत्यं, शिवं, सुन्दरं का भाव समाहित माना जाता है।
.
          बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से संस्कृति-समृद्ध रहा है। शौर्य, रक्षा, क्षमा, दान, वीरता, उत्साह जैसे आन्तरिक गुणों के अतिरिक्त यहां पर्वों, त्यौहारों, व्रतों, मेलों, उत्सवों आदि का आयोजन समय-समय पर होता रहता है। इसी कारण से इस क्षेत्र के जनमानस में हरपल उत्साह का संचार होता रहता है और पर्वों, त्यौहारों, समारोहों के अतिरिक्त श्रम के समय भी मजदूरों, किसानों आदि के द्वारा पूर्ण उत्साह के साथ लोकगीतों का गायन होता रहता है। मंगलाचार, कृषिकार्यों, तीर्थयात्राओं आदि पर गाये जाने वाले लोकगीतों का अपना अलग स्वरूप है। इसी तरह के लोकगीतों के विविध रूप विवाह अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में भी दिखाई देते हैं। विवाह संस्कार की वैविध्य रस्मों पर घर-परिवार की स्त्रियों द्वारा लोकगीत गाये जाने का चलन आज भी है। वैवाहिकी सम्बन्धी छोटे-बड़े सभी प्रकार के आयोजनों में महिलाओं द्वारा उत्साहजनक उपस्थिति लोकगीतों के माध्यम से दिखती रहती है।
.
विवाह संस्कार की विविध रस्मों का प्रारम्भ वर-वधू पक्ष के आपसी समन्वय के बाद से हो जाता है। तदुपरान्त सगाई की रस्म से लेकर वधू के गृह-आगमन तक और उसके पश्चात तक भी लोकगीतों का गायन होता रहता है। लगुन, माटी-मिथौरी, तिलकोत्सव, मण्डप, तेल-चढ़ावा, चीकट उतराई, भात पहनाना, द्वारचार, भांवरें, चढ़ावा, कुंवर कलेवा, मुंह दिखाई, देवपूजन, रोटी छुवाई आदि-आदि अनेक प्रकार की रस्मों में घर-परिवार की, पास-पड़ोस की महिलायें लोकगीतों के साथ अपनी सहभागिता करती हुई इन रस्मों का निर्वाह करती हैं। विवाह संस्कारों में लड़के को इंगित करके गाये जाने वाले गीतों को बन्ना गीत और लड़की को इंगित करके गाये जाने वाले गीतों को बन्नी गीत कहते हैं। बन्ना, बन्नी से तात्पर्य यहां उस लड़के और लडकी से होता है जो विवाह-बंधनों में बंधने जा रहे होते हैं। इस कारण से वर-कन्या के घरों में लोकगीतों के माध्यम से बन्ना-बन्नी गीत गाकर अपनी खुशी प्रकट की जाती है।
.
बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बन्नी गीत का आरम्भ लड़की की लगुन लिखे जाने के अवसर से होता है। इस अवसर पर दैवीय अनुष्ठान आदि के द्वारा वैवाहिक कार्यक्रमों के शुभ मुहूर्त निर्धारित करके मंगल-पत्री को लड़के वालों को सौंपा जाता है। कन्या-पक्ष की महिलायें इस अवसर पर बन्नी गीत गाकर शुभ कार्यक्रमों का आरम्भ करती हैं।
                   ‘‘जनक राजा के अंगना में खुशियां छाईं रे,
                   मंगल घड़ी आई रे, सियाजू के मंगल गाइये।
                   गिरिजा पूजन सीता गईं, रामलला के दर्शन पाये,
                   नैनन बसाई सांवरी मूरत, सियाजू के मंगल गाइये।
                   राजा राम ने तोड़ो धनुष है, राजा जनक को मान धरो है,
                   सिया-राम की जोड़ी सजेगी, सियाजू के मंगल गाइये।’’
.
          विवाह के अवसर पर वर-कन्या में सीता-राम का आरोपण करके इन मंगल लोकगीतों की रचना महिलाओं द्वारा कर ली जाती है। इस अवसर पर सम्पन्न होने वाले अनुष्ठान में महिलायें हर्षोल्लास से लोकगीतों का गायन करती हुई कार्यक्रमों को दिव्यता प्रदान करती हैं। देवअनुष्ठान के साथ पुरोहित जी शुभलग्न का विचार कर रहे होते हैं और महिलायें समूहबद्ध रूप से लोकगीतों का गायन करती हुईं वातावरण को रसमय बनाती हैं-
                   ‘‘दशरथ सुत ने तोड़ो धनुष, मंगलाचार गवत है,
                   रचो रे पत्री, मंगल-पत्री, मिथिला में रस बरसत है।
                   कौन मंगाय कोरे कागज, कौन भरी सियाही शीशी,
                   बाबुल मंगाये कोरे कागज, भैया भरी सियाही शीशी।
                   कोरे कागज पै शुभ मिती भेजो, मिथिला में रस बरसत है।’’
.
          इसी तरह से लोकगीतों में सभी रिश्तेदारों को सम्बोधित करते हुए उसका गायन होता रहता है। विवाह के अवसर पर लगभग समस्त कार्यक्रमों का संचालन महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। इस विविध कार्यक्रमों में महिलाओं की सहभागिता उन कार्यक्रमों को लोकगीतों के द्वारा उल्लासपूर्ण बना देती है। शगुन कार्यक्रम के बाद माटी-मिथौरी, देवताओं का आवहान आदि संस्कारों/रस्मों का निर्वहन किया जाता है और इन अवसरों पर महिलाओं द्वारा देवी गीतों, धार्मिक गीतों का गायन होता रहता है। बन्नी गीतों को अधिकांशतः ऐसे अवसरों पर गाया जाता है जिन कार्यक्रमों में लड़की की उपस्थिति अथवा सहभागिता सीधे-सीधे जुड़ी होती है। घर की स्त्रियां, लड़की की चाची, मामी, मौसी, बुआ, भाभी, बहिनें आदि मजाक करती हुईं बन्नी गीतों को गाती रहती हैं और रस्मों को सम्पन्न करवाती रहती हैं।
.
                   इन रस्मों और कार्यक्रमों के मध्य कन्या के रूप-सौन्दर्य को निखारने, संवारने का कार्य भी चलता रहता है। हल्दी-तेल चढ़ाने की रस्म का प्रतिपादन इसी के लिए किया गया होगा। हल्दी-तेल चढ़ाने की रस्म कहीं-कहीं मण्डपाच्छादन के पूर्व और कहीं-कहीं मण्डप के बाद सम्पन्न होती है। पांच, सात, नौ आदि की विषम संख्या में इस रस्म का समापन होता है। इस रस्म का निर्वाह महिलाओं द्वारा होता है जिसमें कन्या के पैर, हाथ, कंधे, माथे आदि पर तेल-हल्दी लगाई जाती है। इस अवसर पर भी महिलायें लोकगीतों का गायन करती हुईं हंसी-मजाक आदि के द्वारा वातावरण को तरंगित करती जाती हैं-
                   ‘‘आज मोरी बन्नी को तेल चढ़त है,
                   तेल चढ़त है, फुलेल चढ़त है। आज मोरी बन्नी....
                   सोने की बिलियन में तेल भराओ,
                   हल्दी मिला के उबटन चढ़ाओ,
                   बन्नी को रूप कैसो दमकत है। आज मोरी बन्नी....
                   तेल के संगे छुटकी पांखुरियां,
                   भौजी तेल चढ़ाओ बन्नी बांहुरियां,
                   चन्दा सौ रूप कैसो छलकत है। आज मोरी बन्नी....’’
.
          हल्दी-तेल चढ़ाने की रस्म का एक और गीत कुछ-कुछ इसी तरह का ही है, चूंकि लोकगीतों में रस्मों के निर्वहन का रूप छिपा होता है और इसी कारण से अधिकांश लोकगीतों की आत्मा एक जैसी ही होती है। एक अन्य लोकगीत का उदाहरण-
                   ‘‘आज मोरी बन्नी के तेल चढ़त है,
                   तेल चढ़त है, फुलेल चढ़त है। आज मोरी बन्नी....
                   चढ़ गयो तेल, छुटकी पांखुरियां,
                   कौन ल्याओ तेल, कौन पांखुरियां,
                   तेलिन लाई तेल, मालिन पांखुरियां। आज मोरी बन्नी....
                   कौन चढ़ाओ तेल, कौनो पांखुरियां,
                   भौजी चढ़ाईं तेल, बन्नी की बाहुंलियां। आज मोरी बन्नी....’’
.
          विविध कार्यक्रमों के मध्य रस्मों का निर्वहन हंसते गाते होता रहता है। घर के आंगन में मण्डप की रस्म सम्पन्न की जाती है। इस रस्म का निर्वहन घर के पुरुषों विशेष रूप से भाइयों द्वारा किया जाता है। मण्डपाच्छादन की इस प्रक्रिया में भूमि खोदना, लीपना, मण्डप लगाना, कलश रखना, जल भरना आदि क्रियाओं को सम्पन्न किया जाता है। सारी क्रियाओं का वर्णन इस अवसर पर बन्नी गीत के माध्यम से प्रकट होता रहता है। मण्डप के अवसर पर गाये जाने वाले बन्नी गीत की एक बानगी-
                   ‘‘सुगर बढ़ैया, चंदन मड़वा को रुच-रुच के ल्याओ रे।
                   चारउ कौनन पै खम्बा लगाओ रे,
                   बीच में चन्दन मड़वा गड़वाओ रे।
                   गैया को गोबर मंगाओ, ढिंग दै आंगन लिपाओ रे।
                   सुगर बढ़ैया, चंदन मड़वा को रुच-रुच के ल्याओ रे।।
                   भैया ने रोपे चंदन मड़वा,
                   फूफा ने छाये जामुन पत्ता।
                   सोने की थारी बुआ भर ल्याई, छप्पन भोग लगाओ रे।
                   सुगर बढ़ैया, चंदन मड़वा को रुच-रुच के ल्याओ रे।।’’
.
          मण्डप के बाद भी तेल-हल्दी की रस्म होती रहती है और ऐसे अवसर पर महिलायें अपनी कन्या की शोभा का बखान करने से पीछे नहीं रहती हैं। कार्यक्रमों, रस्मों के अतिरिक्त भी घर के अन्य दूसरे कार्यों को सम्पन्न करते समय भी लोकगीतों के माध्यम से बन्नी के गुणगान होते रहते हैं-
                   ‘‘बन्नी की शोभा सजीली है, बन्नी छबी नीकी लागी रे।
                   हल्दी उबटन से रूप संवारो,
                   चन्दा सा सुन्दर मुख है वारो।
                   चारउं दिशा जाकै रूप से दमकें, बन्नी छबी नीकी लागी रे।
                   माथे पै बेंदी दमदम दमकै,
                   कानन में कुण्डल चमचम चमकै।
                   मुतियन को सुन्दर हार गले में, बन्नी छबी नीकी लागी रे।’’
.
          इसके अतिरिक्त बन्नी की शोभा का वर्णन घर की बड़ी-बुजुर्ग महिलायें करते हुए बन्नी गीत को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करती हैं-
                   ‘‘मैया की कोख से जनम लओ है,
                   रूप सांचे में ढार दओ है
                   हमाई बन्नी रुनक-झुनक करी जाये।
                   बाल हैं कारे, अंखियां हैं कारी,
                   सोने की काया पै जाउं बलिहारी,
                   हमाई बन्नी रुनक-झुनक करी जाये।’’
.
          कार्यक्रमों, रस्मों का परम्परागत रूप से निर्वहन होते-होते पाणिग्रहण संस्कार का समय आ जाता है। कन्या को वरमाला कार्यक्रम हेतु सोलह शंृगार के द्वारा तैयार किया जाता है। बारात वर को लेकर कन्या के द्वार पर आ जाती है। वर यहां भगवान का रूप समझा जाता है। वर और कन्या पर राम और सीता का आरोपण कर सभी उन्हें पर्याप्त आदर प्रदान करते हैं। द्वारचार के अवसर पर वर घोड़े पर चढ़कर आता है और कन्या पक्ष की स्त्रियां बन्नी गीत के द्वारा अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करती हैं-
                   ‘‘आज बन्नी को ब्याहन राजा रामजू आये,
                   घोड़ी पै चढ़कै द्वारे पै आये।
                   बन्नी ने रूप रुच-रुच के संवारो,
                   माथे पै बिंदिया, गले में मुतियन हार डारो।
                   आज बन्नी को ब्याहन राजा रामजू आये।
                   हाथन में मेंहदी, आंखन में कजरा लगाओ,
                   नाक में नथिनी, कानन में कुण्डल सजाओ।
                   आज बन्नी को ब्याहन राजा रामजू आये।।’’
.
          इस प्रकार के गीत बन्नी का शृंगार करने के अवसर पर भी गाये जाते हैं। हंसी-खुशी से चहकती स्त्रियां किसी भी रूप में अपनी बन्नी को कम नहीं समझती हैं। वे द्वार पर आये वर की शोभा और बन्नी की शोभा का बखान करती हैं पर अपनी बन्नी को वर से कम नहीं स्वीकारती हैं। इस प्रकार के हंसी-मजाक के वातावरण में ये लोकगीत माहौल को और भी खुशनुमा बना देते हैं-
                   ‘‘बन्ना जी आये बन्नी का ब्याहने,
                   सजे दोनो बराबर हैं, शान बन्नी की न्यारी है।
                   बन्ना के सिर पै सेहरा सोहै,
                   बन्नी के सिर माथे बेंदी सोहै,
                   चमकें दोनो बराबर हैं, शान बन्नी की न्यारी है।
                   सजीलो रूप बन्ना को दमकै,
                   सोलह शृंगार में बन्नी दमकै,
                   रूप दोनो सुहावन हैं, शान बन्नी की न्यारी है।’’
.
          इस प्रकार से बन्नी गीतों के साथ विवाह-संस्कार सम्पन्नता की ओर बढ़ते जाते हैं। अपनी खुशियों को प्रदर्शित करती महिलायें द्वारचार के बाद भी सम्पन्न होने वाली विविध रस्मों में लोकगीतों का गायन करती हैं किन्तु बन्नी गीतों का गायन बन्द हो जाता है। भांवरों के समय, चढ़ावे के समय, मांग भराई, सप्तपदी, बाती मिलाई आदि के अवसर पर भी लोकगीतों के माध्यम से वातावरण को पावन और सरस बनाये रखा जाता है।
.
          देखा जाये तो लोकगीत एक प्रकार की संप्रेषणीयता का कार्य करते हैं। बन्नी गीतों के माध्यम से भी बन्नी के मनोभावों को प्रकट किया जाता है और कई बार बुजुर्ग, अनुभवी महिलाओं के द्वारा एक प्रकार की शिक्षा भी प्रदान की जाती है। लोकगीतों की रोचक लयबद्धता में विवाह सम्बन्धी कार्य भी आसानी से सम्पन्न होते रहते हैं और परिवार में भी हर्षोल्लास का वातवरण बना रहता है। लोकगीत गायन की, बन्ना/बन्नी गीत गायन की परम्परा शहरों की आपाधापी में भले ही विलुप्त हो रही हो किन्तु ग्रामीण अंचलों में और ग्रामीण अंचलों से सम्बद्ध परिवारों में आज भी लोकगीतों की, बन्ना/बन्नी गीतों की मधुरता कानों में रस घोलती है। समय की इबारत पर यह अक्षरशः सत्य है कि बन्नी गीतों का, लोकगीतों का संरक्षण, संवर्द्धन ग्रामीण महिलाओं द्वारा ही हो रहा है; यही ग्रामीण महिलायें अपने गायन द्वारा लोकगीतों की परम्परा को, इस समृद्ध बुन्देली विरासत को पोषित एवं संरक्षित कर रही हैं।
.