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Monday, June 5, 2023

बैरागढ़ की माँ शारदा शक्ति पीठ और आल्हा की सांग

उत्तर प्रदेश के बैरागढ़ गाँव में स्थित मंदिर धार्मिकता, सिद्धस्थल होने के कारण देश भर में विख्यात है. माँ शारदा देवी का मन्दिर जालौन जिले के उरई मुख्यालय से लगभग तीस किलोमीटर दूर ग्राम बैरागढ़ में स्थित है. इस मंदिर में ज्ञान की देवी माँ शारदा की अष्टभुजी मूर्ति स्थापित है. कहते हैं कि इस शक्ति पीठ की स्थापना चन्देलकालीन राजा टोडलमल द्वारा ग्यारहवीं सदी में कराई गई थी किन्तु माँ शारदा की मूर्ति हस्तनिर्मित नहीं है. किवदंती है कि गाँव में स्थित एक कुंड से माँ शारदा स्वयं प्रकट हुई थीं, इसीलिए इस स्थान को शारदा देवी सिद्ध पीठ कहा जाता है. यह स्थल सुवेदा ऋषि की तपोस्थली रही है और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ शारदा कुंड से प्रकट हुई थीं. वह कुंड वर्तमान में इस मंदिर के पीछे बना हुआ है. इस शक्ति पीठ का दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के अनुसार माँ शारदा की यह मूर्ति पूरे दिन में तीन रूपों में दिखाई देती है. प्रातःकाल यह मूर्ति एक कन्या के रूप में दिखती है, दोपहर में इस मूर्ति में युवती का रूप नजर आता है और सायंकाल इसी मूर्ति में माँ का रूप दृष्टिगोचर होता है.

 

बैरागढ़ स्थित माँ शारदा शक्ति पीठ 


माँ शारदा की प्रतिमा 

सम्पूर्ण देश में बैरागढ़ का यह मंदिर अपनी धार्मिकता और सिद्धपीठ होने के कारण प्रसिद्द है तो यह अपनी ऐतिहासिकता के लिए भी विख्यात है. यह स्थल बुन्देलखण्ड के अप्रतिम वीर योद्धा आल्हा और पृथ्वीराज चौहान के युद्ध का साक्षी है. आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो महोबा के दशरथपुरवा गाँव में जन्मे थे. दोनों भाई बचपन से ही अत्यंत वीर और पराक्रमी थे. आल्हा-ऊदल राजा परमाल के सेनापति थे. सन 1181 में उरई के राजा माहिल की कूटनीति पर राजा परमाल ने आल्हा-ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया. जिसके चलते दोनों भाइयों ने कन्नौज के राजा लाखन राणा के यहाँ शरण ली.

 

पृथ्वीराज चौहान को जब इस बात की खबर लगी तो उसे लगा कि आल्हा-ऊदल से विहीन सेना को आसानी से जीता जा सकता है. बुन्देलखण्ड को जीतने के उद्देश्य से पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर आक्रमण कर दिया. कीरत सागर मैदान में चल रहे युद्ध रोकने के लिए पृथ्वीराज ने राजा परमाल से उनकी बेटी चंद्रावल, पारस पथरी और नौलखा हार सौंपने की शर्त रखी. यह शर्त मानना पृथ्वीराज की गुलामी स्वीकारने जैसा था. राजा परमाल की पत्नी मल्हना ने जब यह खबर आल्हा, ऊदल के पास कन्नौज पहुँचाई तो वे दोनों भाई और कन्नौज नरेश ने साधुवेश में कीरत सागर के मैदान में पहुँच कर पृथ्वीराज की सेना को पराजित कर पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया.


आल्हा और ऊदल माँ शारदा के उपासक थे. जिसमें आल्हा को माँ शारदा का वरदान था कि उन्हें युद्ध में कोई नहीं हरा पायेगा. कहा जाता है कि आल्हा-ऊदल और पृथ्वीराज चौहान के बीच 52 बार युद्ध हुआ, जिसमें हर युद्ध में पृथ्वीराज की बुरी तरह से हार हुई. बैरागढ़ का युद्ध इनके बीच का अंतिम युद्ध कहा जाता है. इस युद्ध में ऊदल को वीरगति प्राप्त हुई और आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को पुनः जीवनदान देते हुए वैराग्य ले लिया. इसी कारण से इस स्थान को बैरागढ़ के नाम से जाना जाता है.

 

बैरागढ़ में हुई भीषण लड़ाई में आल्हा के भाई ऊदल को पृथ्वीराज के सेनापति चामुंडराय ने धोखे से मार दिया. अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर आल्हा क्रोध से भर उठे और पृथ्वीराज की सेना पर कहर बनकर टूट पड़े. लगभग एक घंटे के भीषण युद्ध के बाद आल्हा ने पृथ्वीराज को हरा दिया. उसके बाद आल्हा ने विजय पश्चात् माँ शारदा से वरदान स्वरूप प्राप्त सांग को माँ शारदा के चरणों के पास गाड़ दिया. कहते है कि आल्हा ने उस सांग को जमीन से बाहर निकालने की चुनौती पृथ्वीराज चौहान को दी. पृथ्वीराज उस सांग को जमीन से बाहर न निकाल सके. इसके बाद आल्हा ने सांग को ऊपर से टेढ़ा करके उसे सीधा करने की चुनौती दी. इसे भी पृथ्वीराज पूरा न कर सके. पृथ्वीराज चौहान को बुरी तरह से परास्त करने के बाद भी अपने गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया. इसके बाद आल्हा ने बैराग ले लिया और माँ शारदा की भक्ति में लीन हो गए. आल्हा के द्वारा माँ शारदा के चरणों के नजदीक गाड़ी हुई सांग आज भी मन्दिर के मठ के ऊपर निकली दिखाई देती है. ये सांग 30 फिट से भी अधिक ऊँची है और लगभग इतनी ही जमीन में गड़ी है.

 

मंदिर के मठ पर गड़ी आल्हा की सांग 

मन्दिर में आल्हा द्वारा गाड़ी गई सांग इसकी प्राचीनता को दर्शाता है. आज भी बैरागढ़ में माँ शारदा के मंदिर में मान्यता है कि हर रात दोनों भाई आल्हा और ऊदल आराधना करते हैं. कहा जाता है कि रात को सफाई के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं लेकिन सुबह जब कपाट खोले जाते हैं तो वहाँ पूजा करने के प्रमाण मिलते हैं. बैरागढ़ के अलावा माँ शारदा शक्ति पीठ मध्य प्रदेश के सतना के नजदीक मैहर में स्थित है.  

 


मंदिर प्रांगण में बना कुंड, जहाँ से माँ शारदा स्वयं प्रकट हुईं थीं 

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(सभी चित्र लेखक और उसके भाई डॉ. हर्षेन्द्र सिंह सेंगर द्वारा दिनांक 02-06-2023 को खींचे गए हैं.)

Saturday, December 2, 2017

अजेय और गौरवशाली योद्धा कालिंजर दुर्ग

बुन्देलखण्ड के विंध्याचल पर्वत पर अपराजेय योद्धा के रूप में खड़ा कालिंजर दुर्ग सदियों बाद भी अपनी वैभवगाथा, अपनी गौरवगाथा का वर्णन स्वयं करता है। देश के विशाल और अपराजेय माने जाने वाले दुर्ग को सतयुग में कीर्तिनगर, त्रेता में मध्यगढ़, द्वापर में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर के नाम से जाना जाता रहा। यह दुर्ग उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड भूभाग में बाँदा जिले की नरैनी तहसील में स्थित है। लगभग 800 फीट ऊपर स्थित दुर्ग के सर्पाकार मार्ग पर चढ़ते हुए दाँयी ओर विंध्याचल पर्वत दुर्ग की विशालता का आभास करवाता है तो बाँये हाथ पर गहरी खाई और दूर-दूर तक फैले खेत मन मोहते हैं। विंध्याचल पर्वत शृंखला पर लगभग 3.2 वर्ग किमी क्षेत्रफल में स्थित दुर्ग का पौराणिक महत्त्व भी है। कालिंजर को कालंजर का अपभ्रंश कहा जाता है। भगवान शिव को कालंजर के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है मृत्यु को नष्ट करने वाला। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन पश्चात निकले विश को पीने के बाद उसे अपने कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया था। उन्होंने अपनी व्याकुलता को शांत करने के लिए इसी पर्वत पर आकर विष जीर्ण किया था। इसी कारण से इस स्थान को कालिंजर के नाम से पुकारा जाने लगा। इसके अतिरिक्त महाकाव्यों, पुराणों और अन्य प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में कालिंजर को शैव साधना का एक महत्तवपूर्ण केन्द्र स्वीकारा गया है। भागवत पुराण में भी ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना हेतु कालिंजर में ही तपस्या के द्वारा भगवान विष्णु को संतुष्ट किया था।


कालिंजर की इस पौराणिकता की भाँति इसकी ऐतिहासिकता भी विशेष है। जिस पर्वत पर दुर्ग स्थित है उसके दक्षिण-पष्चिम में बाघेन नदी प्रवाहित होती है जो आगे जाकर यमुना नदी में मिल जाती है। प्राचीनकाल में इस दुर्ग पर जैजाकभुक्ति (जयशक्ति चन्देल) का साम्राज्य था। जैजाकभुक्ति बुन्देलखण्ड का ही एक प्राचीन नाम है। इस दुर्ग पर 9वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक चन्देल शासकों का राज्य रहा है। कालिंजर दुर्ग पर चन्देल षासकों के अलावा चेदि, नन्द, मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त आदि राजवंशों का शासन करना भी माना जाता है। वैसे कालिंजर में पुरापाषाणकालीन मानवीय सक्रियता के साक्ष्य मिलते हैं। दुर्ग से अथवा उसके आसपास के क्षेत्र से, पर्वत शृंखला से पुरापाषाणकालीन अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य एवं दस्तावेज के अनुसार कालिंजर दुर्ग पर सर्वप्रथम चेदि शासकों के अधिकार करने का उल्लेख ऋग्वेद की एक दान स्तुति में चैद्य वसु द्वारा ब्रह्यतिथि नामक ऋषि को ऊँटों और गायों के दान किये जाने से मिलता है। इसके साथ-साथ कालिंजर दुर्ग से गुप्तकालीन अभिलेखों के मिलने से यहाँ गुप्त शासकों के सक्रिय रहने का भी प्रमाण मिलता है। इसी तरह कलचुरि वंश के प्रथम शासक कृष्णराज की मुद्राओं से यहाँ कलचुरि शासकों के होने के प्रमाण भी मिले हैं। इसी वंश के दूसरे शासक विज्जल द्वारा कालिंजर पुरवराधीष्वर उपाधि धारण करने ने इस तथ्य को और भी प्रामाणिकता प्रदान की। कलचुरियों के शासन के पश्चात यहाँ पर गुर्जरों-प्रतिहारों का शासन आया। इनके बाद कुछ समय के लिए राष्ट्रकूटों का आधिपत्य रहा और इसके पश्चात चन्देलों का शासन स्थापित हुआ। कालिंजर दुर्ग पर भले ही विभिन्न राजवंशों का शासन रहा हो किन्तु उसको व्यापक प्रसिद्धि चन्देल शासकों के आने के पश्चात प्राप्त हुई। इसका एक प्रमुख कारण उनका लम्बे समय तक यहाँ राज्य करना रहा है। चन्देल शासकों ने यहाँ 9वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक शासन किया। गुर्जर-प्रतिहारों के शासन करने का प्रमाण भोज प्रथम (836-8500) के वाराह ताम्रपत्र से तथा राष्ट्रकूटों के शासन करने का उल्लेख कृष्ण तृतीय के जूरा अभिलेख से मिलता है।

चन्देल शासन में दुर्ग पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेरशाह सूरी और हुमायूँ ने आक्रमण किए लेकिन जीतने में असफल रहे। उपलब्ध दस्तावेजों और अभिलेखों के अनुसार इस दुर्ग पर सन् 10230 में चन्देल राजा विद्याधर के शासन में महमूद गजनबी ने आक्रमण किया था। दुर्ग की अपनी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और पर्याप्त घेरेबन्दी के कारण यह आक्रमण असफल रहा। कालान्तर में सन् 12020 में परमर्दिदेव के शासनकाल में कुतुबुद्दीन ऐबक ने दुर्ग पर हमला किया किन्तु वह भी असफल रहा। सन् 15450 में इस दुर्ग पर शेरशाह सूरी ने आक्रमण किया। वह महीनों इस दुर्ग पर अपना कब्जा करने के लिए परेशान रहा। एक दिन वह स्वयं ही तोप से गोला दागने को आगे आया। दुर्ग की सुरक्षा प्राचीर को लेकर ऐसी धारणा है कि इसकी दीवार पर तोप के गोलों का कोई असर नहीं होता था। कहा तो ये भी जाता है कि तोप के गोले दुर्ग की प्राचीर से टकराकर वापस लौट जाते थे। इसका प्रमाण शेरशाह सूरी के हमले के समय देखने को मिलता है जबकि उसके द्वारा चलाया गया एक गोला दुर्ग की दीवार से टकराकर वापस उसके बारूद के ढेर पर आकर गिरा और फट गया। परिणामस्वरूप शेरशाह सूरी गम्भीर रूप से घायल हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि चन्देल शासनकाल के अन्तिम चरण में सन् 15590 में कालिंजर दुर्ग पर अकबर ने विजय प्राप्त की। किंवदंतियों के अनुसार तत्कालीन चन्देल राजा रामचन्द्र इस किले को स्वयं ही छोड़कर चले गये थे और अकबर ने उस खाली पड़े दुर्ग पर बिना किसी सशस्त्र संघर्ष के अथवा बिना किसी तरह का युद्ध किये कब्जा कर लिया था। दुर्ग को अकबर ने अपने नवरत्नों में से एक बीरबल को उपहारस्वरूप जागीर के रूप में दे दिया। बीरबल के बाद इस दुर्ग पर मुगलों का आधिपत्य बना रहा। इस दुर्ग पर बुन्देलों ने औरंगजेब के काल में हमला करके विजय प्राप्त की और मान्धाता चौबे को कालिंजर का दुर्गपति नियुक्त किया। सन् 18120 में ब्रिटिश कर्नल मार्टिन्डेल ने चौबे परिवार को सदा के लिए दुर्ग से बेदखल करके अपने अधिकार में ले लिया। ऐसा करने के बाद अंग्रेजी शासकों ने कालिंजर को बाँदा जनपद में सम्मिलित किया और दुर्ग को सैनिक छावनी में बदल दिया। इससे पूर्व यह दुर्ग बुंदेल राजा छत्रसाल के अधीन रहा और छत्रसाल के बाद किले पर पन्ना के हरदेवशाह ने अपना अधिकार जमाया था। 

कालिंजर दुर्ग में प्रवेश सात द्वारों से होता है। इसका प्रथम द्वार सिंह द्वार के नाम से पुकारा जाता है। दूसरा गणेश द्वार तथा तीसरा द्वार चंडी द्वार कहलाता है। बुद्धगढ़ द्वार अर्थात् स्वर्गारोहण द्वार चौथा द्वार है जिसके पास भैरवकुंड नामक सुंदर जलाशय है। दुर्ग का पाचवाँ द्वार अत्यंत कलात्मक है जिसे हनुमान द्वार कहा जाता है। छठवें द्वार के रूप में लाल द्वार और सातवाँ एवं अंतिम द्वार नेमि द्वार है, इसे महादेव द्वार भी कहा जाता है। दुर्ग में पहुँचने के लिए वर्तमान में उत्तर दिशा के रास्ते को मुख्य मार्ग के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा है। इसी मार्ग में उक्त सातों द्वार अपना परिचय स्वयं करवाते हैं। लाल बलुआ प्रस्तरखण्डों से निर्मित दुर्ग का सम्पूर्ण वास्तु अपने आपमें अद्वितीय एवं कलात्मक है। सुरक्षा की दृष्टि से सर्वोत्तम माने जाने वाले इस दुर्ग को अकारण ही अजेय दुर्ग का गौरव प्राप्त नहीं है। इसकी सुरक्षा प्राचीर की परिधि लगभग 6 किमी की है। इसकी ऊँचाई 5 मी0 से 12 मी0 तक है और इसी चैड़ाई 4 मी0 से 8 मी0 तक है। 


कालिंजर दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था जितनी अभेद्य है उसकी स्थापत्य कला उतनी ही बेजोड़ है। दुर्ग की महत्वपूर्ण स्थापत्य कलाओं, संरचनाओं में दुर्ग की सुरक्षा प्राचीर, नीलकंठ मंदिर, चौबे महल, रानी महल, राजा अमान सिंह महल, मृगधारा, वेंकट बिहारी मंदिर, पातालगंगा, भैरवकुंड, पांडुकुंड, सिद्ध की गुफ़ा, राम कटोरा, चरण पादुका, सुरसरि गंगा, बलखंडेश्वर, भड़चाचर आदि दर्शनीय स्थलों के साथ-साथ अनेकानेक छोटे-बड़े जलाशय शामिल हैं। कालिंजर के अधिष्ठाता देवता नीलकंठ महादेव हैं। यह दुर्ग का प्राचीन मंदिर है, जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। इसे चंदेल शासक परमादित्य देव ने बनवाया था। यह दुर्ग के पश्चिम कोने में स्थित है। मंदिर में अठारह भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा नीले रंग का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग की विषेशता यह है कि उससे निरन्तर पानी रिसता रहता है। मंदिर के रास्ते पर भगवान शिव, गणेश और हनुमान की प्रतिमाएँ हैं जिन्हें पर्वत काट कर बनाया गया है। नीलकंठ मंदिर का मंडप चंदेल वास्तुशिल्प की अनुपम कृति है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर चंदेल शासक परिमाद्रदेव रचित शिवस्तुति है। मंदिर के ऊपर पर्वत को काटकर दो जलकुंड बनाए गए हैं। जिन्हें स्वर्गारोहण कुंड कहते हैं। इसके नीचे पर्वत को काटकर बनाई गई कालभैरव की प्रतिमा है। किले के परिसर में फैली मूर्तियाँ पर्यटकों और दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। कालभैरव की प्रतिमा सर्वाधिक भव्य है। 32 फीट ऊँची और 17 फीट चैड़ी इस प्रतिमा के 18 हाथ हैं। वक्ष में नरमुंड और त्रिनेत्र धारण किए यह प्रतिमा बेहद जीवंत है। 


नीलकंठ मंदिर के अतिरिक्त भी दुर्ग में सातवें द्वार से प्रवेश करते ही चौबे महल स्थित है। भग्नावशेष के रूप में स्थित इस महल का प्रवेशद्वार एकदम सादा किन्तु आकर्षक स्थापत्य कला का प्रतीक है। दोमंजिला इस महल को चौबे बेनी हजूरी तथा खेमराज ने बनवाया था। इसके आगे के मार्ग पर वेंकट बिहारी मंदिर और रानी महल स्थित हैं। वेंकट बिहारी मंदिर बुन्देलकालीन है और दुर्ग के लगभग मध्य भाग में स्थित है। इस मंदिर में गर्भगृह, आयताकार मंडप, छत पर आकर्षक शिखर तथा छोटी-छोटी स्तम्भयुक्त छतरियाँ स्थित हैं। रानी महल भी दोमंजिला विशाल भवन है। भग्नावशेष होने के बाद भी इसका विशाल प्रवेशद्वार और भीतरी खुला बरामदा सम्मोहित करता है। महल में सीता सेज नामक एक छोटी गुफा है जहाँ एक पत्थर का पलंग और तकिया रखा हुआ है जो किसी समय एकांतवास के रूप में उपयोग में लाई जाती थी। 


दुर्ग में कई छोटे-बड़े जलाशय बने हुए हैं। उनमें से एक जलकुंड सीताकुंड कहलाता है। इसी क्षेत्र में दो संयुक्त तालाब हैं। इसका पानी चर्म रोगों के लिए लाभकारी माना जाता है। कहा जाता है कि इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठरोग दूर हो जाते हैं। क्षेत्र में किंवदंती है कि चंदेल शासक कीर्तिवर्मन का कुष्ट रोग यहाँ स्नान करने से दूर हुआ था। दुर्ग में एक अन्य जलाशय भी है जिसे पातालगंगा नाम से जाना जाता है। इसमें जलप्रवाह निरन्तर बना रहता है। इसके साथ ही औषधीय गुणों से युक्त जल यहाँ के पांडु कुंड में चट्टानों से निरंतर टपकता रहता है। दुर्ग के दक्षिण मध्य की ओर मृगधारा है। यहाँ पर्वत को तराश कर दो कमरों का निर्माण किया गया है। एक में सात मृगों की मूर्तियाँ हैं जिनसे बराबर जल बहता रहता है। इस स्थान को पुराणों में वर्णित सप्त ऋषियों की कथा से सम्बद्ध माना गया है।

वर्तमान में कालिंजर दुर्ग प्ररातत्त्व विभाग की देखरेख में है। विभाग के द्वारा दुर्ग के भीतर यहाँ की बिखरी, क्षतिग्रस्त मूर्तियों को दुर्ग में ही एक संग्रहालय के रूप में सुरक्षित कर रखा है। ये मूर्तियाँ शिल्प कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। यह संग्रहालय बुन्देल शासक अमानसिंह द्वारा दुर्ग के कोटि तीर्थ तालाब के तट पर अपने रहने के लिए बनवाये महल में बना हुआ है। यह महल बुंदेली स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है। 



कालिंजर को कालजयी अकस्मात ही नहीं कहा जाता है। इसने कालखंड के प्रत्येक प्रसंग को चाहे वो प्रागैतिहासिक काल से सम्बद्ध हों, पौराणिक घटनाएँ हों, अनेक विदेशी आक्रांताओं के हमले हों या फिर सन् 1857 का विद्रोह सबको बड़ी खूबसूरती से अपने आँचल में समेट रखा है। वैदिक ग्रन्थों के आधार पर जहाँ इसे विश्व का प्राचीनतम किला माना गया है, वहीं इसके विस्तार और विन्यास को देखते हुए आधुनिक एलेक्जेंड्रिया से भी श्रेष्ठ घोषित किया गया है। इसके बाद भी कालिंजर दुर्ग अभी भी पर्यटन नक़्शे पर उस प्राथमिकता में शामिल नहीं है, जैसा कि उसे होना चाहिए। इसका मुख्य कारण कालिंजर और उसके आसपास के क्षेत्र में पर्यटन सम्बन्धी सुविधाओं का अभाव होना है। अब जबकि दुर्ग पुरातत्त्व विभाग की देखरेख में है; राज्य सरकार की ओर से इसको पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने सम्बन्धी प्रयासों को आरम्भ करने की बात कही जा चुकी है तब आशा की जा सकती है कि निकट भविष्य में कालिंजर का अजेय और गौरवशाली दुर्ग देश के पर्यटन नक़्शे पर भी अपनी आभा तथा गौरवगाथा बिखेरेगा।

Friday, October 16, 2015

बुन्देलखण्ड केसरी महाराजा छत्रसाल का उपेक्षित समाधि-स्थल

बुन्देलखण्ड सदैव ही अपनी आन-बान-शान के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के प्रतापी राजा अपने कार्य, साहस के कारण आज भी अमर-अजर हैं। ऐसे वीर प्रतापी राजाओं में एक महाराजा छत्रसाल का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने अपनी वीरता, पराक्रम और रणनीतिक कौशल से बुन्देलखण्ड को वैभवशाली राज्य के रूप में स्थापित किया था। बुन्देलखण्ड केसरीके रूप में प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल के राज्य का सीमांकन निम्न रूप में वर्णित है-
‘इत यमुना, उन नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस,
छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहू हौंस।’

संग्रहालय में छत्रसाल प्रतिमा के साथ लेखक 
छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत् 1707 (4 मई 1649 ई०) को विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के मध्य बने जंगलों में हुआ था। उनके पिता राजा चम्पतराय को विश्वासघातियों के कारण अपना राज्य गँवा जंगलों में जाना पड़ा। इन्हीं जंगलों, प्राकृतिक वातावरण, रणभूमि में छत्रसाल का पालन-पोषण हुआ, जिससे उनमें किसी भी स्थिति से निपटने की नैसर्गिक क्षमता का विकास स्फूर्त रूप से हुआ। बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता के लिए मुगलों से संघर्ष करने वाले उनके पिता तथा उनकी माता रानी लालकुँअरि ने विश्वासघातियों के कारण आत्माहुति दे दी। ऐसे विपरीत हालातों में भी छत्रसाल ने हार न मानते हुए कालान्तर में सूझबूझ का परिचय देते हुए राष्ट्रीयता के दैदीप्यमान नक्षत्र छत्रपति शिवाजी से सन् 1668 ई० में भेंट की। छत्रपति शिवाजी उनकी वीरता, आत्मविश्वास के साथ-साथ राष्ट्रचेतना, स्वतन्त्रता के प्रति उनकी क्रियाशीलता, दूरगामी नीतियों से प्रभावित हुए। छत्रसाल को स्वतन्त्र राज्य स्थापना हेतु प्रेरित करते हुए छत्रपति शिवाजी ने समर्थगुरु रामदास के आशीष वचन सहित ‘भवानी’ तलवार भेंट की-
                             ‘करो देस के राज छतारे। हम तुम तें कबहूँ नहीं न्यारे।।
                             दौर देस मुगलन को मारो। दपटि दिली के दल संहारो।।
                             तुम हो महावीर मरदाने। करिहो भूमि भोग हम जाने।।
                             जो इतही तुमको हम राखे। तो सब सुयश हमारे भाषे।।

          वीर छत्रसाल स्वराज्य का मंत्र लेकर वापस आकर और अपने साथियों की मदद से 22 वर्ष की उम्र में मात्र 5 घुड़सवारों तथा 25 पैदलों की छोटी सी सेना तैयार की। इतनी छोटी उम्र में सेना का गठन, सैनिकों का चयन वीर छत्रसाल की कार्यक्षमता, बौद्धिक प्रतिभा को दर्शाता है। सेना बनाने के बाद सबसे पहला आक्रमण उन्होंने अपने माता-पिता के विश्वासघाती सेहरा के धंधेरों पर किया। पहले आक्रमण में प्राप्त विजय से जहाँ छत्रसाल और उनके साथियों का मनोबल ऊँचा हुआ वहीं क्षेत्रवासियों में भी उनके प्रति विश्वास बढ़ा। अपनी विजय यात्रा को बढ़ाते हुए छत्रसाल बुन्देलखण्ड राज्य की स्वतन्त्रता और उसके विस्तार हेतु लगातार प्रयासरत रहे। उन्होंने पूर्व में चित्रकूट और पन्ना का क्षेत्र, पश्चिम में ग्वालियर, उत्तर में कालपी से लेकर दक्षिण में सागर, गढ़कोटा और दमोह तक अपने राज्य का विस्तार किया। उनके रणविजय की पताका मालवा, बघेलखण्ड, राजस्थान, पंजाब तक पहराने लगी थी, जिसके चलते यमुना, चम्बल, नर्मदा, टोंस आदि नदियों में बुन्देल राज्य स्थापित हो गया था।

जैतपुर में हुए अंतिम युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित होने की स्थिति में आने लगे। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बाजीरव पेशवा को अपने पुराने सम्बन्धों का परिचय देते हुए एक काव्यात्मक पत्र लिखा, जिसकी चन्द पंक्तियाँ पूरे पत्र का सार प्रस्तुत कर देती हैं-
                   जो गति गज और ग्राह की, सो गति भई है आज।
                             बाजी जात बुन्देल की, राखौ बाजी लाज।।
महाराजा छत्रसाल का ताम्रपत्र 
इस पत्र के मिलते ही बाजीराव पेशवा की सेना ने मुहम्मद बंगश पर आक्रमण कर पराजित कर दिया। इस युद्ध में महाराजा छत्रसाल पराजित हो सकते थे किन्तु मराठों के साथ अपने प्रगाढ़ रिश्तों के चलते अपना और बुन्देलखण्ड राज्य का सम्मान बचाए रखा। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य का बंटवारा अपने दोनों पुत्रों और बाजीराव में कर दिया। बाजीराव से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मस्तानी, जिसे वे अपनी पुत्री मानते थे, के साथ उनका विवाह करवा दिया। बुन्देलखण्ड राज्य का विस्तार चहुँ ओर करने वाले प्रतापी महाराजा छत्रसाल ने पौष शुक्ल तृतीया संवत् 1788 (19 दिसम्बर 1731 ई०) को अपने बसाये नगर छतरपुर में नौगाँव के निकट अंतिम साँस लेकर जगमगाते नक्षत्रों में शामिल हो गये। बाजीराव पेशवा ने उनके सम्मान में समाधि-स्थल का निर्माण छतरपुर जिले में धुबेला ग्राम में धुबेला ताल के पास करवाया।

महाराजा छत्रसाल का समाधि स्थल 
आजीवन बुन्देलखण्ड की स्वतन्त्रता, उसके स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने वाले महाराजा छत्रसाल की अंतिम निशानी वर्तमान में उपेक्षा का शिकार है। धुबेला में उनके नाम से राजकीय  संग्रहालय का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इसी संग्रहालय परिसर में मस्तानी महलभी स्थित है। कहते हैं कि बाजीराव ने बंगश पर विजय प्राप्त करने के बाद यहीं आकर मस्तानी से विवाह किया था और छत्रसाल ने उनके रुकने की व्यवस्था इसी महल में करते हुए इसका नाम मस्तानी महल रखा था। इसी राजकीय संग्रहालय के पार्श्व में महाराजा छत्रसाल की पहली रानी कमलापति की स्मृति में बना समाधि स्थल है। यहाँ से लगभग एक सौ मीटर की दूरी पर महाराजा छत्रसाल की समाधि स्थित है। ये अपने आपमें आश्चर्य का विषय है कि महाराजा छत्रसाल के नाम से संचालित राजकीय संग्रहालय में उनसे सम्बन्धित विक्रमी सम्वत 1759 (सन् 1702 ई०) का ताम्रपत्र है, जिसमें उनकी उपलब्धियों, दान देने की सनद, ताम्रपत्र लिखने की तिथि एवं स्थान आदि का उल्लेख मिलता है। महाराजा छत्रसाल को चित्रांकित करती एक पेंटिंग तथा संग्रहालय के प्रांगण में आदमकद प्रतिमा भी देखने को मिलती है। इनके अतिरिक्त महाराजा छत्रसाल से सम्बन्धित किसी भी प्रकार की सामग्री इस संग्रहालय में नहीं है।

महाराजा छत्रसाल की पत्नी की कमलापति की समाधि 
बुन्देलखण्ड के नाम को अपने नाम से पहचान देने वाले महाराजा छत्रसाल की शासन अथवा प्रशासन स्तर से मात्र इतनी ही उपेक्षा नहीं की जा रही है। उनके दुर्ग के भग्नावशेष, उनकी और उनकी पहली पत्नी की समाधि भी उपेक्षा का शिकार है। धुबेला ताल के किनारे बनी इन दोनों समाधियों को संग्रहालय परिसर से अलग रखा गया है, जिसके कारण से स्थानीय क्षेत्रवासियों द्वारा इनके शिल्प और स्थापत्य के साथ पर्याप्त छेड़छाड़ की जा रही है। संग्रहालय से लगी हुई टूटी, उखड़ी हुई सड़क, उसके आसपास उगी कंटीली झाडि़यां, खरपतवार आदि स्पष्ट रूप से इसका संकेत देते हैं कि संग्रहालय के अलावा महाराजा छत्रसाल के शेष स्मारकों की सुरक्षा अथवा रखरखाव की ओर शासन-प्रशासन का ध्यान नहीं है। समाधि स्थल के पत्थरों को तोड़ देना, उन पर किसी भी ठोस वस्तु से अपने नाम को उकेर देना आदि आम रूप में देखा जा सकता है। 

मस्तानी महल 
रानी कमलापति समाधि स्थल के आसपास पक्का निर्माण होने के कारण वहाँ गन्दगी का साम्राज्य स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देता है किन्तु महाराजा छत्रसाल के समाधि स्थल को यह सौभाग्य भी प्राप्त नहीं है। उसके आसपास का स्थान कच्चा, मिट्टीदार होने के कारण बहुत बड़ी संख्या में जगली पेड़-पौधों, खरपतवारों, कंटीली झाडि़यों आदि ने उस इमारत को घेर रखा है। कुछ इसी तरह की स्थिति संग्रहालय परिसर में स्थित मस्तानी महल की है। उसके अंदर की दीवारें जर्जर, जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं। वहाँ आने वालों द्वारा एवं स्थानीय लोगों द्वारा पान खाकर थूकने का, दीवारों पर खरोंचने का काम किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त आसपास के क्षेत्रवासियों द्वारा, बड़ी संख्या में युवाओं द्वारा इन गौरवशाली प्रतीकों को मौजमस्ती का अड्डा बना लिया गया है। इनके आसपास बड़ी संख्या में सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, शराब आदि सेवन करने के अवशेष देखने को मिलते हैं। देखा जाये तो सरकारी स्तर पर इन ऐतिहासिक स्थलों की देखरेख करने की, अराजक तत्वों से इनको बचाये रखने की, इनके जीर्णोद्धार आदि की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसी कारण से इन ऐतिहासिक स्मारकों पर, धुबेला ताल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।


यह अपने आपमें शर्म का विषय है कि जहाँ एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्य बुन्देलखण्ड की आन-बान-शान के लिए न्यौछावर कर दिया वहीं स्वयं बुन्देलखण्डवासी ही उसके प्रतीकों की, उसकी धरोहर की उपेक्षा करने में लगे हुए हैं। 

Tuesday, December 30, 2014

फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद



फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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जा बहुतई बड़ी बिडम्बना कही जैहे के जोन बुन्देलखण्ड कभऊँ वीरन से खाली नईं रही, जिते पे दूसरे की रच्छा के लाने जान देबो गरब की बात समझी जात हती, जिते दुसमन की मुड़ी काट लेबो हँसी-मजाक जैसो रहत हतो उते के किसान भैया आत्महत्या अब जैसे कदमन को उठान लगे हैं. आये दिना अब सुनबे को मिलन लगो है कि कभऊँ कौनऊ किसान ने फांसी को फंदा लगा लओ, कभऊँ कितऊँ और के किसान भैया ने आत्महत्या कर लई. जा बहुतई ख़राब हालत दिख रई है और जाके पीछे के कारन ढूंडबे को काम कोऊ नईं कर रओ है. गाओं-दिहात के लोग सरकार को दोस लगान लगत हैं और सरकार किसान भैयन को दोसी बताउत है. ऐसोई होत रैहे तो कौन कछू लाभ निकरहै. सबसे पहलूँ तो हम सबई जनन को मिल बैठ के काम करबे की, मेलजोल बढ़ाबे की जरूरत है. इतै कछुएक समय से देखबे को मिल रओ है के अपएं सिगरे गाओं-दिहात एकदम से सहर बनत जा रए हैं. इतै के लोग पढ़-लिख के सहर की तरह भगन में लगे हैं और जो कछु थोड़े-बहुत गाओंन में रह रए हैं बेऊ सहर बालिन जैसो ब्योहार करन लगे हैं. आपस में मिल-बैठ के कोऊ बात करबो नईं चाहत है, एक-दूसरे की राम-जुहार भये कहो महीनन निकर जाए, एक-दूसरे के सुख-दुःख को कौनऊ ख्यालई नईयाँ. ऐसो थोड़ेई होत रहो हतो गाओंन में और ऐसोई होबो अच्छी बात नईयाँ. 
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नेक जापे बिचार करियो के कौनऊ किसान भैया पे संकट आ गओ है, कौनऊ मुस्किल आन पड़ी है, कोऊ परेसान कर रओ है तो बो का करहै. या तो अकेलेई संकटन से निपटे या फिर अकेले लड़-लड़ के मर जैहे. समस्या सबई पे आत हैगी पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के बाए अकेले छोड़ दओ जाए. आजकल खेती-किसानी बैसेईं बहुतईं कठिन हो गई हैगी, कभऊँ पानी कम बरसबे को संकट तो कभऊँ जादा बरसबे से फसल ख़राब होबे को डर; कभऊँ फसल को दाम सही न मिलबे को रोबो तो कभऊँ बैंकन को रोबो. अब ऐसे में यदि सबई जनें संगे होयें, मिल-बैठ के कछु समाधान सोचो जाए तो ऐसो नईयाँ के कौनऊ हल न निकरे. एक बात तो सबई जनन को मानने पड़है कि जा देस में, जा समाज में किसानी करबो सबसे मुस्किल काम हैगो और उत्तो लाभऊ नईं रह गओ, जित्ती के बामें मेहनत लग जात है, लागत लग जात है, पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के सिगरे किसानियई बंद कर दें. ऐसोई यदि सीमा पे लगबे बारे बीर जुआन सोचन लगें तो का हुईए?
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जाके लाने गाओं के किसान भैया एक-दो बातन को ख्याल रख लें तो सियात कछु दिक्कत कम होबे. एक तो हम गाओं के लोगन को जे सहर बालिन की फिजूल की नक़ल करबो बंद कर देन चइए, कायेसे कि जासे मिलत कछु नईयाँ, नुकसान ऊपर से हो जात है. जे सहर की नक़ल करके जाने कौन-कौन से खर्चा अब सिगरे गाओंन में होन लगे हैं. जौन काम में तनक सो खर्चा आत हतो अब बामें मार तामझाम करो जान लगो है. जेई दिखाबे के चक्कर में छोटे किसान भैया गाओं के बड़े किसानन से, जमींदारन से, आसपास के महाजनन से, अपने रिश्तेदारन से, बैंकन से कर्जा ले लेत हैं. एक तो मौसम के मारे, फसल को दाम सही से न मिल पाबे के मारे किसानन को कछु लाभ हो नईं पा रओ, तापे जो कर्जा..... सोई किसान भैया परेसान रहन लगत हैं. अपने जान-पहचान बालिन से, बैंकन से कर्जा लेबो बुरी बात नईयाँ पर बाको गलत इस्तेमाल बुरो है. और आजकल जोई जादा हों लगो है. बस एक जोई काम सही से करबे की ठान लेओ, फिर देखो जाने कित्ती समस्याएं अपएं आप दूर खड़ी दिखाई दैहें. चलो, भैया उरें, अभे के लाने इत्तियई बात, बाकी थोड़ी-मोरी और कर लई जैहे अगली बार. तब तक के लाने राम-राम.

Monday, December 15, 2014

लाला हरदौल : बुन्देलखण्ड के लोक-देवता



बुन्देलखण्ड की पावन-भूमि ने हमेशा ही अपनी उर्वरा-भूमि से वीर-वीरांगनाओं को जन्म दिया है. ये वीर-वीरांगनायें आज भी किंवदन्तियों और जनश्रुतियों के द्वारा हमारे बीच उपस्थित हैं. इनमें से कुछ ने तो मनुष्यत्व से उपर उठकर देवत्व स्थान प्राप्त कर लिया है. इसके पीछे इनकी वीरता, आदर्शवादिता, चारित्रिक विशेषताओं के साथ-साथ आमजन की इनके प्रति श्रद्धा एवं विश्वास भी अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं. बुन्देलखण्ड की असंख्य वीर-वीरांगनाओं के बीच ऐसा ही एक नाम लाला हरदौल के रूप में जन-जन के मध्य प्रतिष्ठित है, जो अपने श्रेष्ठतम गुणों, भाभी के सतीत्व की खातिर प्राण न्यौछावर करने और पारिवारिक मर्यादाओं, संस्कारों का भली-भांति निर्वहन करने के कारण देवत्व रूप में स्थापित हो चुका है. वीर हरदौल द्वारा देवर-भाभी के रिश्ते की पावनता, पवित्रता को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए किये गये विषपान ने और मरणोपरान्त अपनी भांजी के विवाह संस्कार को निर्विध्न सम्पन्न करवा देने की जनश्रुति ने उन्हें सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड के आराध्य के रूप में प्रतिष्ठित करवा दिया है. आज भी शायद ही कोई हिन्दू परिवार होगा जहां पर विवाह के मंगल अवसर पर महिलाओं द्वारा मंगलगीत गाकर लाला हरदौल को ब्याह का न्यौता न दिया जाता हो.
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लाला हरदौल ओरछा नरेश वीर सिंह बुन्देला के सबसे छोटे पुत्र तथा ओरछा के प्रतापी महाराजा मधुकरशाह के नाती थे, इनकी माता का नाम गुमान कुँअरी था जो नरेश वीर सिंह बुन्देला की दूसरी पत्नी थी. हरदौल का जन्म श्रावण शुक्ल पूर्णिमा संवत १६६५ (दिनांक २७ जुलाई १६०८ ई०) को दतिया में हुआ था. दतिया का इलाका रामशाह के बड़े पुत्र संग्राम सिंह की रियासत में आता था और सन १५९५ ई० में उनके देहांत के पश्चात् उनका पुत्र भरतशाह यहाँ का जागीरदार बना. भरतशाह ने दतिया के उत्तरी भाग स्थित एक पहाड़ी पर भरतगढ़ का निर्माण करवाया, जिसे कालांतर में वीर सिंह बुन्देला ने हस्तगत कर लिया. इसी भरतगढ़ में लाला हरदौल का जन्म हुआ था. उधर ओरछा के तत्कालीन राजा रामशाह आगरा में जहाँगीर की कैद में थे. सन १६०८ ई० में जहाँगीर ने उन्हें इस शर्त पर रिहा किया कि वे ओरछा का राज्य वीर सिंह को देकर चंदेरी-बानपुर चले जाएँ. ऐसा होने पर वीर सिंह बुन्देला भरतगढ़ से ओरछा आ गए.
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हरदौल के जन्म के कुछ दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया, ऐसे में उनका पालन-पोषण वीर सिंह बुन्देला के ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह की पत्नी चम्पावती ने किया. हरदौल का विवाह सन १६२८ ई० में दुर्गापुर (दतिया) के दिमान लाखन सिंह परमार की पुत्री हिमांचल कुंअरी के साथ संपन्न हुआ. सन १६३० ई० में उनके एक पुत्र विजय सिंह पैदा हुआ.  लाला हरदौल ने अल्पायु में ही जबरदस्त प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी. इसके पीछे उनका वीर योद्धा होने के साथ-साथ धर्मवीर, दानवीर, दयावीर आदि होना भी था. दरअसल वीर सिंह बुन्देला ने हरदौल को शस्त्र के साथ-साथ शास्त्रों की भी शिक्षा दिलवा रखी थी. स्वयं हरदौल भी अपने पिता के साथ युद्ध अभियानों में नियमित रूप से जाते रहते थे, इस कारण उनको युद्ध विद्या का वास्तविक ज्ञान भी हो गया था. इन गुणों के कारण जनता में वे लोकप्रिय हो गए थे और जनता भी उन्हें देवताओं की तरह पूजती थी. हरदौल की वीरता, उनके पराक्रम और जनता में उनकी लोकप्रियता देखकर ओरछा नरेश वीर सिंह बुन्देला ने एरच का जागीरदार बना दिया. किसी जागीर के राजा के रूप में हरदौल की ये पहली सनद थी. कालांतर में वीर सिंह बुन्देला जब अत्यंत वृद्ध हो गए और उनकी अस्वस्थता के चलते उनके पुत्रों में लगातार विद्रोह जैसी स्थिति बन रही थी. पारिवारिक समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए हरदौल को दतिया राज्य का दिमान बनाया. तत्कालीन व्यवस्था में दिमान के पास प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ सेना का भी दायित्व हुआ करता था. पुत्रों के बीच किये गए जागीरों के बंटवारे में अबकी हरदौल के हिस्से में एरच के स्थान पर बड़ागांव की जागीर आई.
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लाला हरदौल के सम्बन्ध में दो घटनाएँ बुन्देलखण्ड क्षेत्र में चर्चा में रही हैं. पहली घटना के अनुसार सन १६२७ ई० में वीर सिंह बुन्देला का देहांत हो गया. नियमानुसार ओरछा की गद्दी पर उनके उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह आसीन हुए, लाला हरदौल के पास दिमान का पद यथावत रहा. इधर ओरछा में सत्ता परिवर्तन हुआ और उधर मुग़ल शासन में भी सत्ता परिवर्तन हुआ. जहाँगीर की मृत्यु होने के पश्चात् शाहजहाँ की ताजपोशी आगरा किले में सन १६२८ ई० में की गई. इस रस्म का निमंत्रण ओरछा के तत्कालीन नरेश जुझार सिंह को भी भेजा गया. लाला हरदौल, चम्पत राय सहित अन्य बुन्देला राजाओं ने, सरदारों ने जुझार सिंह को इस समारोह में न जाने की सलाह दी. इसका कारण बुंदेलों और मुगलों के सम्बन्ध अच्छे न होना था. इधर जुझार सिंह लगातार विद्रोह कर रहे अपने अन्य भाइयों और पारिवारिक समस्याओं से परेशान थे और इससे छुटकारा पाने के लिए संरक्षक के रूप में मुग़ल शासक का साथ चाहते थे, उधर विद्रोहियों के साथ लगातार युद्ध करते-करते शाहजहाँ के पास पर्याप्त धन और सेना का अभाव हो गया था. दोनों ही अपने-अपनी समस्याओं के चलते एक-दूसरे का साथ चाहते थे किन्तु इसमें मूल अंतर ये था कि जुझार सिंह बिना किसी धोखे के मुग़ल शाहजहाँ की मदद चाहता था जबकि शाहजहाँ जुझार सिंह को धोखे से बंदी बनाकर उसे सहायता देने को मजबूर करना चाहता था. शाहजहाँ के इस षडयंत्र की जानकारी जुझार सिंह को कतई नहीं थी, वे तो आगरा जाने से रोकने की बात को अपने भाइयों का विद्रोह जैसा ही समझ रहे थे. अंततः जुझार सिंह ने किसी की बात न मानते हुए आगरा जाने का निर्णय लिया और अपने साथ नजराने के रूप में एक लाख रुपये और चार हाथी लेकर आगरा जा पहुँचे. जिस बात की आशंका हरदौल और अन्य बुन्देला सरदारों ने जताई थी, हुआ भी कुछ वैसा ही. जुझार सिंह को कैद किये जाने की पूरी योजना थी, जिसकी भनक किसी तरह जुझार सिंह को लग गई और वे बिना किसी को बताये आगरा से ओरछा भाग निकले. शाहजहाँ को जब इसका पता चला तो उसने महावत खान को जुझार सिंह का पीछा करने भेजा. महावत खान ने जुझार सिंह के भाई भगवान राय और पहाड़ सिंह की सहायता से ओरछा के पास सतारा नदी किनारे जुझार सिंह को पकड़ने की योजना बनाई. इधर हरदौल ने महावत खान की सेना का सामना करने के लिए सतारा नदी के तट पर घेराबंदी कर ली. जम कर युद्ध हुआ जिसमें महावत खान को पराजय का मुँह देखना पड़ा. इससे भी हरदौल की ख्याति और बढ़ गई.
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इस घटना के बाद से शाहजहाँ की नजरों में हरदौल खटकने लगे. वो किसी भी तरह से जुझार सिंह और अपने बीच के रास्ते में आ रहे हरदौल को समाप्त करना चाहता था. सतारा नदी तट की पराजय के कुछ दिन बाद महावत खान ने कुचक्र रचना शुरू कर दिया. उसने जुझार सिंह के कान हरदौल के विरुद्ध भरने प्रारंभ कर दिए. इसी के साथ ओरछा और आसपास के क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में उसके सिपाहियों द्वारा आतंक फैलाया जाता रहा और ये सिद्ध किया जाता रहा कि ये सब हरदौल से शाहजहाँ की नाराजगी के कारण हो रहा है. जुझार सिंह लगातार विरोधियों के कुचक्र में फँसते जा रहे थे और उनको विश्वास होने लगा था कि ओरछा या आसपास होने वाली अराजक गतिविधियों का कारण हरदौल है. महावत खान को जब इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि जुझार सिंह हरदौल से नाराज हैं तो उसने जुझार सिंह को शाहजहाँ से मुलाकात करवाने और ओरछा में शांति कायम करवाने के लिए तैयार कर लिया. इस बार भी हरदौल ने जुझार सिंह को रोकने की कोशिश की किन्तु वे हरदौल की बातों को न मानकर आगरा के लिए निकल गए. आगरा में जुझार सिंह के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, उन्हें तलवार की दम पर शाहजहाँ ने अपने पैरों पर झुकने को मजबूर कर दिया. अंत में जुझार सिंह की रिहाई के बदले १५ लाख रुपये, ४० हाथी और करैरा का परगना भी देना पड़ा. इसके अलावा दक्षिण में मुग़ल सेना के साथ जाने की नौकरी करने को भी बाध्य होना पड़ा.
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जुझार सिंह मुग़ल सेना के साथ दक्षिण में थे और यहाँ ओरछा के दिमान होने के नाते हरदौल लगातार सत्ता सञ्चालन करने में लगे थे. उनका शासन जुझार सिंह के शासन की तुलना में ज्यादा उत्तम रूप से चल रहा था. ओरछा के विरोधी भी लगातार परास्त होते जा रहे थे. इसके अलावा हरदौल का साथ देने के लिए भी अन्य छोटे-छोटे राजा तैयार होते जा रहे थे. अपनी वीरता और शौर्यक्षमता के कारण वीर हरदौल ने मुगलों से अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की. वीर हरदौल के साहसिक कारनामों से मुसलमानों में खलबली मच गई और इस्लाम के प्रचार-प्रसार की कुचेष्टा से इनका बुन्देलखण्ड की सीमा में आना-जाना बन्द हो गया. हरदौल की ये कामयाबी शाहजहाँ के साथ-साथ जुझार सिंह को भी खटक रही थी. इस बीच सन १६२९ ई० में शाहजहाँ की कैद से खानजहान लोधी अपनी सेना सहित आगरा से भाग निकला. चूँकि खानजहान बुन्देलाओं का सहयोगी रहा था ऐसे में हरदौल ने उसे ओरछा की सीमा से निर्बाध निकल जाने में मदद की. जब शाहजहाँ को इसकी खबर लगी तो वो आगबबूला हो उठा, उसने जुझार सिंह को आदेश दिया कि जिंदा या मुर्दा खानजहान लोधी को पकड़ा जाये. मजबूरन जुझार सिंह को अपने बेटे विक्रमाजीत को लोधी को पकड़ने भेजना पड़ा. काफी मुश्किलों के बाद भी खानजहान लोधी तो नहीं पकड़ा गया किन्तु उसका भाई और बेटे को मारने में विक्रमाजीत को सफलता मिली. हालाँकि इस युद्ध में २०० बुंदेला सैनिक भी मारे गए. जुझार सिंह का मानना था कि ये समस्या सिर्फ हरदौल के कारण सामने आई है, इसको और पुष्ट करने का काम हरदौल के विरोधियों ने किया, वे जुझार सिंह के कान भरने में पीछे नहीं रह रहे थे. जुझार सिंह ने तय कर लिया कि अब हरदौल को रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.
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ओरछा में दशहरा उत्सव की तैयारियाँ चल रही थी. हर बार की तरह हरदौल भी अपने साथियों के साथ ओरछा किले आये हुए थे. जुझार सिंह भी ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थे कि हरदौल को किसी बहाने से आसानी से अपने रास्ते से हटा सकें. आश्विन शुक्ल दशमी संवत १६८८ (दिन रविवार दिनांक ५ अक्टूबर १६३१) को दशहरा का उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा था. जुझार सिंह ने भोज के समय हरदौल और उनके साथियों को तीव्र विषयुक्त भोजन खिलवा दिया. जहर इतना तीव्र था कि हरदौल और उनके साथियों की हालत तुरंत बिगड़ने लगी. जब उन्हें लगने लगा कि अब वे बच नहीं सकते हैं तो अंतिम समय में भगवान रामलला के दर्शन करने ओरछा मंदिर में गए और वहीं उनका देहांत हो गया. जब नगर में ये समाचार फैला तो हरदौल के प्रशंसकों ने उपद्रव कर दिया. जुझार सिंह पहले से ही ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार बैठे थे और उन्होंने उत्पात करने वाले लगभग ९०० हरदौल समर्थकों को मरवा दिया.
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हरदौल की मृत्यु से सम्बंधित एक और कथा समाज में प्रचलित है. एक कूटनीतिक चाल के तहत जब शाहजहाँ ने लाला हरदौल के बड़े भाई ओरछा नरेश जुझार सिंह को आगरा बुला लिया तो जुझार सिंह की अनुपस्थिति में फारस का एक मुगल ओरछा में इस्लाम के प्रचार के लिए आ गया. उसने प्रचार के साथ-साथ ओरछा में आतंक मचाना भी शुरू कर दिया. विपत्ति के ऐसे समय में जुझार सिंह की पत्नी रानी चम्पावती ने लाला हरदौल को एरच से ओरछा बुलवा कर पठान को मरवाने का आदेश दिया. लाला हरदौल वैसे भी अपने बड़े भाई जुझार सिंह से और अपनी भाभी रानी चम्पावती से अत्यधिक स्नेह रखने के कारण ओरछा आते-जाते रहते थे और जुझार सिंह की अनुपस्थिति में यहां का शासन भी देखते थे. ओरछा में लाला हरदौल के आने के समाचार ने वीरों में उत्साह का संचार कर दिया. वे सभी अपने पूरे जोशोखरोश से पठान का मुकाबला करने लगे. पठान के बारे में कहा जाता था कि उसकी तलवार से लोहे के अस्त्र भी कट जाते थे, उससे मुकाबला करने के लिए किसी विशेष अस्त्र की आवश्यकता थी. ऐसे विपरीत समय में रानी चम्पावती ने लाला हरदौल को पठान का मुकाबला करने के लिए जुझार सिंह की पूजा वाली विशेष तलवार दे दी जो एक विशेष प्रकार के बक्से में रहती थी. महाराज जुझार सिंह की विशेष तलवार से लाला हरदौल ने पठान का वध कर दिया. पठान का वध होते ही एक ओर जहां ओरछा उत्साह और खुशी में झूम उठा वहीं दूसरी ओर लाला हरदौल के विरोधियों के सीने पर साँप लोट गया.
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शाहजहां ने जुझार सिंह पर लाला हरदौल को राज्य से निकालने का दबाव बनाया किन्तु लाला हरदौल से पुत्रवत् स्नेह रखने के कारण जुझार सिंह इस बात के लिए कतई तैयार नहीं हुए. शाहजहां ने भी हार न मानते हुए कूटनीति के द्वारा लाला हरदौल और रानी चम्पावती के मध्य अनैतिक सम्बन्धों का शक जुझार सिंह के अन्दर पैदा कर दिया. शाहजहां की इस कूटनीति का व्यापक प्रभाव जुझार सिंह के ओरछा लौटने पर हुआ जबकि लाला हरदौल के विरोधियों द्वारा लाला हरदौल और रानी चम्पावती के मध्य अनैतिक सम्बन्धों की चर्चा, पठान को मारने के लिए जुझार सिंह की पूजा वाली तलवार रानी द्वारा लाला हरदौल को देने की बात पता चली. कान के कच्चे जुझार सिंह ने रानी चम्पावती को मजबूर किया कि वे खाने में विष मिलाकर हरदौल को धोखे से खिला दें. हरदौल को जब ये बात चम्पावती ने बताई तो उन्होंने माँ समान भाभी के सतीत्व की रक्षा की खातिर विषयुक्त भोजन बिना किसी हिचक के ग्रहण कर लिया. कहा ये भी जाता है कि लाला हरदौल के देहांत के बाद उनके मेहतर ने, घोड़े और कुत्ते ने उसी विषयुक्त भोजन को खाकर अपने प्राण त्याग दिए तथा नगर में समाचार फैलते ही उनके लगभग ९०० समर्थकों ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली.
उक्त दोनों घटनाओं के संदर्भों को यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जुझार सिंह अन्य भाइयों के विद्रोह और मुग़लों के आतंक के कारण परेशान रहा करते थे. कहीं न कहीं किसी कारण से उनके और हरदौल के मध्य भ्रम की, मतभेद की स्थिति बनी हुई थी. उनको इस बात का डर पैदा कर दिया गया था कि यदि लाला हरदौल पर जल्द ही अंकुश न लगाया गया तो वे किसी न किसी दिन ओरछा की गद्दी से जुझार सिंह को उतार कर स्वयं आसीन हो जायेंगे. मतभेद की बात कई जगह सामने आई है किन्तु इस बात के स्पष्ट संकेत कहीं नहीं मिले कि जुझार सिंह ने ये माना हो को उनकी पत्नी और हरदौल के बीच अवैध सम्बन्ध रहे. यहाँ इस तथ्य को स्मरण रखना होगा कि हरदौल के जन्म के समय उनके पिता वीर सिंह की आयु ६६ वर्ष थी, जुझार सिंह और उनकी पत्नी चम्पावती की आयु क्रमशः ४५ वर्ष और ३९ वर्ष थी. जुझार सिंह के पुत्र विक्रमाजीत की आयु १९ वर्ष थी और तो और विक्रमाजीत का पुत्र हरदौल के जन्म के कुछ दिनों बाद ही पैदा हुआ था. इस सम्बन्ध में भी वात्सल्यपूर्ण एक घटना प्रचलित है. चूँकि हरदौल के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही उनकी माता का देहांत हो गया था इस कारण उन्हें स्तनपान करवाने का दायित्व विक्रमाजीत की पत्नी कमल कुंअरी को सौंपा गया. जब हरदौल को दूध पिलाने के लिए लाया जाता तो बाकायदा सूचित किया जाता कि कक्का जू पधार रहे हैं, रिश्ते में हरदौल कमल कुंअरी के चचिया श्वसुर हुआ करते थे. कमल कुंअरी ससम्मान घूँघट डालकर खड़ी हो जाती और लाला हरदौल को गोद में लेकर स्तनपान करवाने के पश्चात् ससम्मान विदा करती. ऐसी वात्सल्यपूर्ण स्थिति होने के कारण दूसरी घटना पर सहजता से विश्वास नहीं किया जा सकता है.
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हरदौल की मृत्यु के पश्चात् उनकी बहिन कुंजावती हरदौल का पार्थिव शरीर दतिया ले आई, जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया. लाला हरदौल की बहिन कुंजावती दतिया के राजा रणजीत सिंह को ब्याही थी. हरदौल के समाधि स्थल पर एक मंदिर का निर्माण किया गया जो आज भी स्थापित है तथा लोगों की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. सन १७१५ ई० में दतिया के राजा रामचंद्र ने हरदौल मकबरे के समीप एक तालाब का निर्माण भी करवाया, जिसका नाम हरदौल के नाम पर लला का ताल रखा, इसे आज लाला का ताल कहा जाता है. लाला हरदौल के देहांत के बाद की एक कथा आज भी सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड क्षेत्र में श्रद्धा और आस्था के साथ सुनी-सुनाई जाती है. कहते हैं कि हरदौल के देहांत के कुछ समय बाद उनकी बहिन कुंजावती की बेटी का विवाह संपन्न होना था. कुंजावती लाला हरदौल की मृत्यु को लेकर अपने बड़े भाई जुझार सिंह से नाराज थी और इसी कारण वह अपनी पुत्री कुंअरि के विवाह में भात के लिए लाला हरदौल की समाधि पर पहुंची. लाला हरदौल की समाधि पर बहिन कुंजावती ने आँसुओं भरी गुहार लगाई कि यदि लाला हरदौल अपनी भांजी के विवाह में भात लेकर नहीं आये तो वह भी आत्महत्या कर लेगी. तब लाला हरदौल ने उसे दर्शन देकर विवाह में भात लाने का आश्वासन दिया. सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में ऐसी मान्यता है कि लाला हरदौल ने अपनी बहिन कुंजावती की बेटी के ब्याह में भात की रस्म का निर्वहन किया और बाद में दर्शन देकर अपने देवत्व को प्रतिष्ठित किया.
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ऐसी जनश्रुति है कि विवाह के अवसर पर भात की सामग्री गाड़ियां भर-भर कर आने लगीं. लाला हरदौल ने उचित समय पर स्वयं बहिन को भात पहनाया और बारात को भी अदृश्य रूप से भोजन के समय घी परोसने का कार्य किया. बारातियों को घी का पात्र तो दिखाई देता था किन्तु घी परोसने वाला नहीं दिखाई देता था. जब दूल्हे के सामने घी का पात्र आया और अदृश्य स्वर सुनाई दिया-“घी लीजिए” तो दूल्हे ने घी का पात्र अपने हाथों से पकड़ कर पहले दर्शन देने को कहा. दूल्हे की अनुनय भरी जिद पर लाला हरदौल ने सभी को दर्शन दिये और पाँच गाँव अपने मान्य को दान में देकर अन्तर्ध्यान हो गये।
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इन दिव्य-दर्शनों, वीरोचित गुणों ने वीर हरदौल को समूचे बुन्देलखण्ड का लोकदेवता बना दिया. बुन्देलखण्ड के गांवों के अतिरिक्त उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान के गांवों में भी लाला हरदौल के चबूतरे पाये जाते हैं. विवाह के अवसर पर लाला हरदौल को निमंत्रित करने वाले कुछ लोग तो ओरछा जाकर उनकी समाधि पर निमंत्रण-पत्र चढ़ाते हैं. जो लोग ओरछा पहुँचने में असमर्थ होते हैं वे अपने गाँव अथवा आसपास किसी क्षेत्र में बने हरदौल चबूतरा पर जाकर वैवाहिक निमंत्रण-पत्र चढ़ाते हैं. ऐसी मान्यता है कि लाला हरदौल विध्न-बाधाओं को रोककर मांगलिक कार्य निर्विध्न संपन्न होने देते हैं. हिन्दू विवाह के मंगल अवसर पर लाला हरदौल के आने का विश्वास, मान्यता उनके प्रति बुन्देलखण्डवासियों की श्रद्धा-भक्ति को ही दर्शाता है. मनुष्य के कृत्य ही उसको इतिहास के पन्नों में स्वर्णांकित करते हैं और उसे देवत्व के आसन तक ले जाते हैं. वीर हरदौल भी श्रद्धा और विश्वास के द्वारा देवत्व आसन पर विराजित होकर बुन्देलखण्ड के आराध्य रूप में हमारे बीच आज भी जीवित हैं और सदा-सदा को जीवित रहेंगे.