Tuesday, May 1, 2018

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 23

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 

पिछली पोस्ट में इस जनपद जालौन में लेसली के अभियान की चर्चा हुई थी। इससे आगे का इतिहस यह है कि जब अंग्रेजी सेना यहाँ से निकल गई अंग्रेजों ने कालपी का किला गंगाधर राव को वापस कर दिया। इस प्रकार यहाँ पर मराठों का राज बना रहा। 1898 तक गंगाधरराव बल्लाल खेर काफी बूढ़े हो गए थे। उनके गोविन्द गंगाधरराव बल्लाल खेर नाम का एक पुत्र था। जालौन के इतिहास में उनको नाना साहब और कहीं-कहीं नाना पंडित भी कहा गया है। गंगाधर राव के बड़े भाई सागरवाले बाला जी के भी रघुनाथ राव नाम का एक पुत्र था। दोनों भाइयों के पुत्र अभी कम उम्र के थे, इस कारण दोनों खेर बंधुओं ने 14-12-1798 में जिले के इटौरा नामक गाँव में बैठक कर के गुरसराय के दिनकर राव अन्ना को दोनों का संरक्षक बनाया। इसके बाद गंगाधर गोविन्दराव की मृत्यु जल्द ही 1801 में हो गई। गंगाधर राव की मृत्यु से पहले की एक प्रमुख घटना उनके द्वारा पेशवा के आदेश से हैदराबाद के नवाब के वंशज और दिल्ली के वजीर के पद से भगाए गए नवाब गाजीउद्दीन खां को बावन गाँव देने की है जिसके लिए जी० एस० सरदेसाई ने मराठों का नवीन इतिहास भाग दो में लिखा कि इन बावन गांवों से जिले में कदौरा-बावनी स्टेट की स्थापना हुई। कदौरा-बावनी के इतिहास को यहीं छोड़ कर अभी मराठों के इतिहास की चर्चा करे कि गंगाधर राव के बाद यहाँ क्या हुआ। कदौरा के बारे में अलग से चर्चा होगी जब जिले की अन्य रियासतों की चर्चा करूंगा।

गंगाधर गोविन्द की मृत्यु के बाद उनके पुत्र गोविन्द गंगाधर जालौन के शासक हुए। मराठों में बाबा का नाम धारण करने की प्रथा है। उसके बाद पिता का नाम जोड़ते हैं। इस कारण कभी-कभी भ्रम भी हो जाता है। तो अब जब गोविन्द लिखा जाय तब ध्यान रखिए। इनका कार्यकाल बहुत ही उथल-पुथल का रहा है। परिवार में मनमुटाव हुआ। इन्ही के समय में यहाँ पर अंग्रेजों का अधिकार भी हुआ। अंग्रेजों ने यहाँ पर किस प्रकार से अधिकार किया इस बारे में मैंने एक पूरा अध्याय अलग से लिखा है अत: उसको यहाँ पर छोड़ कर देखें कि सागर वालों से इनका मनमुटाव क्यों और कैसे हुआ? कालपी और कालपी का किला अंग्रेजों को दे देने के कारण गोविन्द राव ने कालपी छोड़ दी और 1806 से जालौन में रह कर अपने बचे हुए राज्य का शासन करने लगे। कुछ वर्षों से गोविन्द राव और उनके सगे खानदानी सागर के रघुनाथ राव उर्फ़ आवा साहब के संबंधों में खटास पैदा हो गई थी। असल में बुंदेलखंड का पूरा इलाका पेशवा की व्यक्तिगत जागीर थी। सतारा के मराठा राज से इसका कोई संबंध नहीं रह गया था। पेशवा की इच्छा थी कि बड़े होने के कारण रघुनाथ राव सागरवाले का पुत्र ही बुंदेलखंड का मामलातदार बने। लेकिन रघुनाथ राव के कोई पुत्र नहीं था। इस कारण यह तय हुआ कि नाना गोविन्द राव के जो पुत्र हो उसको रघुनाथ राव गोद ले लें और आगे चल कर वही बुंदेलखंड का मामलातदार बने। गोविन्द राव इसके लिए तैयार हो गए। अत: जब जालौन में गोविन्द राव के यहाँ पुत्र पैदा हुआ तो सागर खबर भेजी गई। सागर में बड़ी खुशियाँ मनाई गईं और उत्सव में पांच हजार रुपए खर्च किए गए। उस समय शिशु मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी, दुर्भाग्य से यह शिशु पुत्र भी कुछ दिनों बाद ही मर गया। कुछ वर्षों बाद जालौन में गोविन्द राव के यहाँ फिर एक पुत्र पैदा हुआ। सागरवाले रघुनाथ राव ने इस दूसरे पुत्र को गोद लेने का प्रस्ताव रखा परन्तु अबकी बार गोविन्द राव ने इस प्रस्ताव को नहीं स्वीकार किया और कहा कि मेरे एक ही पुत्र है इसको गोद नहीं दे सकता। रामचन्द्र लाघटे ने अपनी मराठी पुस्तक पुस्तक गोविन्द पन्त बुन्देल्यांची कैफ़ियात के पेज 170-71 में लिखा- पुढे नानासाहेबांस जालवणास पहिला पुत्र झाल्या. त्याचा उत्सव सागरी उभय्नता बाई साहेबानी व विनायकराव यानी पांच हजार रूपये खर्च करून साखरा वाटल्या. नंतर तो मूल कांही दिवस राहून मृत्यश पावला। जालवनास पुढे नानासाहेब दूसरा पुत्र झाला। राजा साहेब तेव्हां नाना साहेब कडील बोलणे की हा पुत्र एकच आहे दत्तक देऊ नये। शास्त्र संमंत नाही। आणखी होइले तो देऊ , या प्रमाने करार झाला। इस कारण सागर और जालौन वालों में दरार बढ़ गई। बाद में जनरल मार्शल और ब्रिगेडियर वाटसन ने सागर पर अधिकार कर लिया। कोई औलाद न होने के कारण विनायक राव और रुकमा बाई को जो सागर का सूबा संभाले थीं, अंग्रेजों ने दोनों को जबलपुर निर्वासित करके दो लाख पेंशन देकर सागर पर अंग्रेजों का शासन शुरू किया। जालौन के गोविन्द राव का सागर पर कानूनी अधिकार बनता था अत: उनको सागर की आमदनी में से 1,18,360 रुपए सालाना देना मंजूर कर लिया मगर शासन अंग्रेजों के पास ही रहा। 22 अक्टूबर, 1822 को गोविन्द राव की जालौन में मृत्यु हुई। 

गोविन्द गंगाधर राव के मरने पर उनके पुत्र बालाजी गोविन्द जालौन के शासक हुए। इनके शासन में प्रजा बड़ी सुखी थी। लेकिन ये अन्दर से दुखी रहते थे। इसका कारण अंग्रेज थे। बालाजी के मन में अंग्रेजों के प्रति बड़ी घृणा थी। अपने बचपन में ही इन्होने अपने पिता के समय में कालपी सहित बड़े भाग पर अंग्रेजों का अधिकार होते देखा था। इनके समय में कालपी में अंग्रेजों की तरफ से कैप्टेन रेमजे तैनात था। उसका शासन बड़ा सख्त था। बालाजी कभी कभी कालपी में अपने आदमियों के द्वारा बवाल करवा दिया करते थे। इस काम के लिए ये पिंडारियों की मदद लिया करते थे जिनको इनके पूर्वजों ने ऐट के पास बसा रखा था। बाद में इस गाँव को पिंडारियों के रहने के कारण पिंडारी गाँव के नाम से जाना जाने लगा। 1824-25 में लार्ड कांबियार के सेनापतित्व में अंग्रेजी सेना भरतपुर का घेरा डाले थी। मध्य भारत में अंग्रेजों को फंसा देख कर बालाजी ने अपने सेनापति अन्ताजी के साथ पिंडारियों के दस्ते भेज कर अंग्रेजों के कालपी और कोंच इलाके में भारी लूटपाट करवाई। कुछ गावों में आगजनी की घटनाएँ करवाई। इन घटनाओं के पीछे बालाजी की मूल भावना यह थी कि उनके राज के जिन भागों में उनके पिता के राज काल में अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया था वहाँ अंग्रेजी राज के प्रभाव की स्थापना न हो सके। दोनों सत्ताएँ एक-दूसरे को उखाड़ने की कोशिश में लगी थीं। कंपनी ने संरक्षण और जन सुरक्षा के आश्वासन में स्थानीय लोगों के सहयोग से अपनी योजना प्रारंभ की वहीं बालाजी ने लूट, आराजकता और अव्यवस्था की नीति अपनाई।

बुंदेलखंड में नियुक्त पोलिटिकल एजेंट एन्सले ने इन घटनाओं से परेशान होकर झाँसी के मराठा सूबेदार रामचंद्र राव से सहायता मांगी। एन्सले के अनुरोध पर रामचंद्र राव ने तुरन्त ही 400 सवारों, 1000 पैदल सैनिकों और दो तोपों को अंग्रेजों की मदद के लिए कालपी भेज दिया। यह सेना समय से कालपी आ गई, इस कारण कालपी लूटपाट से बच गई। कुछ इतिहासकारों ने इसको कालपी विद्रोह कहा है। झाँसी के सूबेदार रामचंद्र राव की इस मदद की अंग्रेजों ने बहुत सराहना की। 16 जनवरी, 1825 के पत्र में एम० एन्सले ने झाँसी के दीवान भीखाजी को लिख कर कहा कि पराशन के मुन्ना पंडित के नेतृत्व में किए गए कोंच के विद्रोह के दमन के लिए आपका धन्यवाद। लार्ड बैन्टिक भी रामचंद्र से बहुत हुआ और 9 दिसंबर 1832 को उनको महाराजाधिराज फिदवी बादशाह जामशाह इंगलिस्तान की उपाधि से विभूषित किया। फारेन पोलिटिकल कन्सल्टेशन 14 जनवरी, 1833 न० 51 से पता चलता है कि रामचन्द्र राव को नक्कारा चंवर और यूनियन जैक (अंग्रेजी झंडा) भी दिया गया था।

बालाराव के समकालीन कवि राजा राम ने इनकी बहुत प्रशंशा की है।
जनक ज्यों ज्ञानिन में जामवंत स्वपद में।
ध्रुव ज्यों ध्यानीन में सुंदर विरजा हैं।।
परुशराम वीरन में राम रण धीरन में।
गंगाजल नीरन में सिद्ध कर्त काजा हैं।।
राजाराम कहें सदा वेद ज्यों विधानन में।
कुवेर धनवानन में दूसरो न राजा है।।
उदित उदार महाराज वीर बाला राव।
राजन में राजा दूज राजन में राजा हैं।।

बालाराव का शासन केवल दस वर्षों का ही रहा। 13 जनवरी, 1832 को इनकी जालौन में मृत्यु हो गई। इनके कोई औलाद नहीं हुई थी इस कारण गद्दी के कई दावेदार पैदा हो गए। गुरसराय के केशवराव और झाँसी के विश्नराव उनमे प्रमुख थे। बालाराव की पत्नी लक्ष्मीबाई अपने छोटे भाई को गद्दी पर बैठना चाहती थी। कंपनी सरकार ने लक्ष्मीबाई की बात मान ली। कंपनी सरकार की अनुमति से लक्ष्मीबाई ने अपने छोटे भाई को गोद लेकर गोविंदराव के नाम से जालौन की गद्दी पर बैठाया। इस बारे में एक पत्र इण्डिया आफिस लाइब्रेरी में फ़ाइल न० आईओआर/एफ/1498/58824 मई 1832-जुलाई. इण्डिया पोल.16 सितंबर.1835E/4/754 है जिसके पेज न० 28-29 के कंटेंट्स इस प्रकार हैं जो आपसे साझा कर रहा हूँ।
Death of Jalaun chief Bala Rao Govind, Papers regarding Jalaun State- death on 13 january, 1832 of the Chief of Jalaun Bala Rao Govind – Bangal Government recognize his brother-in-Law Rao Govind Rao, as the chief . Claim of Bishan Rao of Jhansi and Gursaray rejected.

आज इतना ही, आगे का हवाल अगली पोस्ट में।

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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