Wednesday, December 27, 2017

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 2

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
ए०घोष ने इंडियन आर्कियोलोजी (१९६३-६४) ए रिव्यू में लिखा कि आर्यों के आगमन के पहले से ही यहाँ पर कोल, भील, शबर, गोंड से मिलती-जुलती जातियों का निवास था। डा० सुनीत कुमार चटर्जी ने कहा कि आर्यों ने द्रविणों को दास, आग्नेय जाति वालों को कोल, भील और निषाद तथा मंगोल जाति के लोगों को किरात कहा है। आर्यों ने इनको अनास भी कहा है। सुयणाचार्य ने अनास का अर्थ आस्य रहित अर्थात वाणी विहीन किया है अर्थात अनस वे थे जिनकी बोली आर्यों की समझ में नहीं आती थी। पुराणों में यक्ष, राक्षस, नाग, किरात आदि का उल्लेख है यह आर्येतर जातियों के अस्तित्व की ही सूचना है। आर्यों का यहाँ पर आने के बाद यहाँ के निवासियों कोई संघर्ष नहीं हुआ। उन्होंने स्थानीय निवासियों को यहाँ से जाने के लिए मजबूर नहीं किया। प्राचीन साहित्य में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों का यहाँ पर रहने वालों से कोई युद्ध हुआ था। ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता गया आर्य यहाँ के निवासियों में मिश्रित हो गये। जो जातियां यहाँ पर निवास करती थीं उनकी भी अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। आर्यों ने उनकी सभ्यता और संस्कृति से छेड़छाड़ भी नहीं की बल्कि उनको तथा उनकी सभ्यता और संस्कृति को अपनाने में कोई भी गुरेज नहीं किया। वैदिक देवताओं के साथ-साथ उनके देवता जैसे नाग, गण आदि को भी स्थान मिलना इस बात का पुख्ता प्रमाण है। अधिकांश विद्वानों का यही मानना है कि जो आर्य यहाँ पर आए उन्होंने आपस में मिश्रित होकर यहाँ एक जनसमूह की रचना की। कहा जा सकता है जालौन क्षेत्र में स्थानीय आबादी, जिसके देवता और संस्कृति अलग-अलग थे, का उदय होने लगा था। लगता है वैदिक युग के आर्य मोक्ष के लिए ललायित नहीं थे। वे मानते थे कि सारी सृष्टि किसी एक प्रच्छन्न शक्ति से चल रही है तथा उस शक्ति की आराधना करके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वैदिक प्रार्थनाएँ सबल, स्वस्थ्य, प्रफुल्लित जीवन को प्राप्त करने के लिए हैं।

हम सौ वर्षों तक जियें/ हम सौ वर्षों तक अपने ज्ञान को बढ़ाते रहें/ हम सौ वर्षों तक आनन्दमय जीवन व्यतीत करें/ जो स्वयं उद्योग करता है, इंद्र उसी की सहायता करते हैं/ हम सदा प्रसन्नचित रहते हुए उदीयमान सूर्य को देखें।

आर्य भावुक और प्रकृति-पूजक थे। उनके प्रधान देवता अग्नि, इंद्र, वरुण, पूषण, सोम, उषा, थे। आर्य और अनार्य सभ्यता के प्रादुर्भाव का स्पष्ट प्रमाण आर्यों के उस दृष्टिकोण से प्राप्त होता है जो उन्होंने अनार्यों के लिंगम और उस ईश्वर के प्रति, जिसका वह प्रतीक है, अपनाया। इस विषय में ऋग्वेद में (७,२१,५) एक महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। जिसका देवता लिंग है वे हमारे पुण्यस्थल में प्रविष्ट न होने पावें। बाद में इस लिंग उपासना के प्रति आर्यों का जो भय था वह जाता रहा। शादी-विवाह के द्वारा यहाँ के लोगों के साथ संबंध बढ़ा तब शिव भी आर्यों के देवता हो गए। बाद में तो अनार्यों के देवता शिव, पशुपति अधिक महत्वशाली स्थान प्राप्त कर लेते हैं और बी०एन०लूनिया ने तो भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का विकास में लिखा कि यजुर्वेदके युग में से तो शिव बड़े महान देवता का रूप प्राप्त कर लेते हैं। जालौन के प्राचीन इतिहास की यही रुपरेखा मिलती है। बहुत निश्चयात्मक रूप कुछ नही कहा जा सकता है। आगे बढने से पहले जालौन के नामकरण के बारे में चर्चा करते हैं, फिर आगे चलें।

जालौन के नामकरण के संबंध में एक सामान्य विश्वास यह है कि इसका नाम जालिम नाम के एक ब्राह्मण के साथ जुड़ा है जिसने इसको बसाया। एक मान्यता यह भी है कि किसी जालिम सिंह कछवाहा द्वारा यह स्थान बसाया गया उसी के नाम पर यह स्थान बिगड़ के जालवन फिर जालौन हुआ। जालौन के इतिहास के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ कहना बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात जो निश्चित रूप से कही जा सकती है वह यह है कि यह स्थान पुरातन काल से ही मुनियों, संतों द्वारा पोषित होता रहा है। तो आइये इस दृष्टिकोण से भी नामकरण को देखें और सोचें।

शंकराचार्य ने वेद और वेदांत के प्रचार-प्रसार के लिए सभी संन्यासियों को संगठित करके उन्हें दस वर्गों में विभाजित किया था, जिन्हें गिरि, पूरी, सरस्वती, अरण्य, तीर्थ, आश्रम, पर्वत, भारती तथा सागर आदि नामों से जाना जाता है। इसी संप्रदाय की एक सखा वनभी थी। जिसकी एक पीठ लगभग एक हजार वर्ष पूर्व जालौन के उत्तरी छोर में यमुना नदी के किनारे पर थी। यह स्थान अब जालौन खुर्द कहलाता है। इसी वन शाखा की गद्दी पर पीठाधीश्वर जाल नामक ऋषि थे। उनके नाम जाल में वन जोड़ने से जालवन बनता है। उनका आश्रम यहाँ होने के कारण यह स्थान जालवन कहलाने लगा। बाद में यह पीठ पंचनदा में कंजौसा चली गई। कंजौसा के सभी महंतों के नाम के साथ अभी भी वन जुड़ा रहता है। १८७४ के जालौन के दरबारियों की जो सूची मैंने कुछ दिनों पहले पोस्ट की थी उसमे भी क्रम संख्या ३८ पर कंजौसा के महंत जगदीस वन का नाम देखा जा सकता है। इससे इस वन सखा का महत्व का पता चलता है। तो जाल ऋषि के नाम पर अगर यह स्थान जालवन हो गया तो क्या कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है। लोग यह भी सवाल कर सकते हैं कि जालवन से यह जालौन कैसे हो गया? तो इस पर मेरा कहना यह है कि यह उर्दू भाषा के कारण हुआ क्योंकि उर्दू में जालवन को जालौन भी पढ़ा जा सकता है। उच्चारण अशुद्ध होने लगा। एक बात और आपको बता दूँ, पुराने बहुत से दस्तावेजों में इसका नाम जालवन भी मिलता है। अपने यहाँ के भूतपूर्व विधायक गरीबदास जी के अनुसार सन १९३२ के रामलीला विज्ञापन के पर्चों में जालौन को जालवन ही लिखा जाता था।


तो जालौन के नामकरण की चर्चा के बाद आज यहीं तक। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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